Hemant Soren's 'Mission Surprise'

हेमंत सोरेन का ‘मिशन सरप्राइज’: जब बिना सायरन और बिना काफिले के  प्रोजेक्ट पहुँचे CM  हेमंत सोरेन , सचिवालय की धड़कनें!

हेमंत सोरेन का ‘मिशन सरप्राइज’: जब बिना सायरन और बिना काफिले के  प्रोजेक्ट पहुँचे CM  हेमंत सोरेन , सचिवालय की धड़कनें!

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Hemant Soren's 'Mission Surprise'

रांची:  झारखंड की राजनीति में मंगलवार का सूरज एक ऐसी तस्वीर लेकर आया जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की थी। जिस शहर को मुख्यमंत्री के काफिले के सायरन सुनने की आदत हो, वहाँ जब सूबे का मुखिया एक साधारण गाड़ी में ‘आम आदमी’ बनकर ट्रैफिक के बीच से निकला, तो प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया।

क्या था मुख्यमंत्री का ‘सीक्रेट प्लान’?

यह कोई तकनीकी चूक नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का एक  स्टेल्थ ऑपरेशन’  था। सूत्रों की मानें तो सीएम यह देखना चाहते थे कि जब वीआईपी प्रोटोकॉल की बैरिकेडिंग हटती है, तो रांची की सड़कों पर ‘आम झारखंडी’ का हाल क्या होता है।
बिना पायलट, बिना प्रोटोकॉल न आगे पायलट गाड़ियाँ थीं, न पीछे सुरक्षाकर्मियों का रेला।

ट्रैफिक टेस्ट:  रेड सिग्नल पर रुकना और शहर की भीड़ का हिस्सा बनना—सीएम ने खुद अनुभव किया कि जनता रोजाना किन चुनौतियों से दो-चार होती है।

प्रोजेक्ट भवन में ‘सन्नाटा’ और ‘सन्न’ अधिकारी

जैसे ही बिना किसी पूर्व सूचना के मुख्यमंत्री की इकलौती गाड़ी सचिवालय (प्रोजेक्ट भवन) के गेट पर आकर रुकी, वहाँ तैनात गार्ड्स की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।

आमतौर पर मुख्यमंत्री के आने से 15 मिनट पहले पूरा इलाका छावनी में तब्दील हो जाता है, लेकिन मंगलवार को नजारा बिल्कुल उलट था। सादगी की इस मिसाल ने अधिकारियों को यह कड़ा संदेश भी दे दिया कि ‘सरकार’ कभी भी, कहीं भी पहुँच सकती है।

रिस्क या रियलिटी चेक?

राजनीतिक पंडित इसे हेमंत सोरेन की कनेक्टिविटी पॉलिटिक्स’  से जोड़कर देख रहे हैं।
1. जनता से जुड़ाव: यह संदेश देना कि वे महलों या सुरक्षा घेरों में कैद नेता नहीं हैं।
2. प्रशासनिक कसावट: यह उन विभागों के लिए चेतावनी है जो वीआईपी मूवमेंट के नाम पर ही सक्रिय होते हैं।

हालांकि, सुरक्षा के जानकारों ने इसे एक ‘बड़ा जोखिम’ करार दिया है, लेकिन मुख्यमंत्री के चेहरे की सहजता ने यह साफ कर दिया कि वे अपनी जनता के बीच खुद को सबसे सुरक्षित महसूस करते हैं।

जाहिर है की  झारखंड के इतिहास में  किसी राज्य के मुखिया की ऐसी सादगी  की पहली घटना है । क्या यह ‘सरप्राइज कल्चर’ अब झारखंड की नई कार्यसंस्कृति बनेगा? यह देखना दिलचस्प होगा।

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