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जामताड़ा एम्बुलेंस न मिलने से मरीज की मौत मामला, मंत्री के सामने खुला पोल

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जामताड़ा: झारखंड के जामताड़ा जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं के दावों की धज्जियाँ उड़ा रही है। एंबुलेंस का इंतजार करते-करते जब समय बीत गया, तो परिजनों ने ट्रैक्टर की ट्रॉली पर खटिया बिछाकर मरीज को अस्पताल पहुँचाया, लेकिन रास्ते में ही जिंदगी ने दम तोड़ दिया।

क्या है पूरा मामला?

शुक्रवार (12 जून) की रात को मोनू टुडू की तबीयत अचानक बिगड़ गई। परिजनों ने जीवन बचाने की अंतिम उम्मीद में सरकारी ‘108 एंबुलेंस’ सेवा को बार-बार फोन किया। आरोप है कि घंटों गुहार लगाने के बावजूद न तो एंबुलेंस आई और न ही कंट्रोल रूम से कोई संतोषजनक जवाब मिला। जब हर तरफ से दरवाजे बंद दिखे, तो लाचार परिजनों ने ट्रैक्टर का सहारा लिया। ऊबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरती ट्रैक्टर की ट्रॉली पर मरीज को सदर अस्पताल तो लाया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

मंत्री के सामने खुला ‘सफेद झूठ’

शनिवार को स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी घटनास्थल पर स्थिति का जायजा लेने पहुँचे। बातचीत के दौरान जब मंत्री ने मामले को सामान्य ‘दुर्घटना’ बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की, तो मृतक के बेटे बिमल टुडू ने सब कुछ बयां कर दिया। मंत्री के ठीक सामने खड़े होकर बिमल ने रोते हुए उन तमाम कॉल रिकॉर्ड्स और अपनी बेबसी की कहानी सुनाई, जिसने मौके पर मौजूद अधिकारियों और खुद मंत्री को निरुत्तर कर दिया।

प्रशासनिक लापरवाही या सिस्टम की नाकामी?

यह घटना केवल एक मौत नहीं, बल्कि जिले के लचर स्वास्थ्य तंत्र का आईना है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि 108 सेवा ने समय पर तत्परता दिखाई होती, तो मोनू टुडू आज जीवित होते।

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सवाल जो अब उठ रहे हैं:

108 एंबुलेंस का कंट्रोल रूम किसलिए है, अगर आपातकाल में वह मदद न पहुँचा सके?

क्या स्वास्थ्य विभाग इस प्रशासनिक चूक की जिम्मेदारी तय करेगा?
ग्रामीण इलाकों में एंबुलेंस की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विभाग ने अब तक क्या ठोस कदम उठाए हैं?

फिलहाल, इस घटना के बाद पूरे क्षेत्र में आक्रोश है और स्वास्थ्य मंत्री के सामने हुई इस तीखी बहस के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में दोषियों के खिलाफ क्या कार्रवाई करता है।

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