जमशेदपुर: भीषण गर्मी में दो हिस्सों में बंटा बचपन, कहीं ‘लग्जरी’ तो कहीं ‘जानलेवा डुबकी
अमीरी-गरीबी के बीच सिमटता बचपन; निजी पूल की सुविधा से वंचित बच्चे जान जोखिम में डालकर स्वर्णरेखा और नहरों में उतरने को मजबूर।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!(नीरज तिवारी, जमशेदपुर)
जमशेदपुर में लगातार बढ़ता तापमान और भीषण गर्मी ने शहर की सामाजिक असमानता की एक कड़वी हकीकत को सबके सामने ला खड़ा किया है। पारा 40 डिग्री के पार होने के साथ ही शहर के बच्चों की दुनिया दो अलग-अलग हिस्सों में बंट गई है।
क्या है हालात?
एक ओर शहर के पॉश इलाकों में स्थित लग्जरी क्लब, निजी स्विमिंग पूल और वाटर पार्क हैं, जो बच्चों की चहल-पहल से गुलजार हैं। यहाँ प्रशिक्षित लाइफगार्ड, आधुनिक फिल्टर प्लांट और सुरक्षा के तमाम इंतजाम हैं। वहीं दूसरी ओर, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे हैं, जिनके लिए इन जगहों की महंगी मेंबरशिप और एंट्री फीस एक सपना बनकर रह गई है।
सुरक्षा पर बड़ा खतरा
निजी क्लबों की सख्त नियम-शर्तों और ‘ड्रेस कोड’ जैसी औपचारिकताओं से दूर, ये बच्चे गर्मी से राहत पाने के लिए स्वर्णरेखा नदी, शहर की नहरों और असुरक्षित तालाबों का रुख कर रहे हैं। इन खुले जलस्रोतों में न तो कोई सुरक्षा है और न ही लाइफगार्ड।
पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर गौर करें तो गर्मियों के दौरान नदी या तालाब में डूबने से होने वाली मौतों की घटनाएं चिंताजनक रही हैं, लेकिन इसके बावजूद सुरक्षित सार्वजनिक विकल्पों की कमी बनी हुई है।
प्रशासन से सवाल: क्या सुरक्षित बचपन का अधिकार नहीं?
शहर के विकास की दौड़ में कम से गरीब बच्चों के लिए सार्वजनिक खेल-कूद और जलक्रीड़ा केंद्र क्या नही होने चाहिए ?
समाधान की जरूरत: प्रशासन और कॉर्पोरेट सेक्टर को मिलकर ऐसे ‘पब्लिक पूल’ विकसित करने चाहिए जहाँ मामूली शुल्क पर आम आदमी के बच्चे भी गर्मी से राहत पा सकें।
जागरूकता: जब तक सुरक्षित विकल्प उपलब्ध नहीं होते, तब तक बच्चों को असुरक्षित जलस्रोतों के खतरों के प्रति जागरूक करना बेहद जरूरी है।
क्या हमारा शहर वाकई समावेशी है?
यह सवाल हर नागरिक के मन में है। जब तक हर बच्चे को बिना किसी भेदभाव के गर्मी से राहत का सुरक्षित ठिकाना नहीं मिलता, तब तक यह असमानता न केवल सामाजिक बल्कि एक मानवीय संकट बनी रहेगी।
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