SIR करना चुनाव आयोग का अधिकार : सुप्रीम कोर्ट , स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ को मिली हरी झंडी
डेस्क :भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए चुनाव आयोग (ECI) की उस प्रक्रिया को संवैधानिक रूप से वैध करार दिया है, जिसे ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के नाम से जाना जाता है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस प्रक्रिया के खिलाफ दायर सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।
पूरा मामला
पिछले साल (जून 2025) में चुनाव आयोग ने बिहार से मतदाता सूचियों के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ की शुरुआत की थी। इसके बाद इसे पश्चिम बंगाल समेत अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी लागू किया गया। इस प्रक्रिया के तहत एक प्रावधान यह रखा गया था कि जिन मतदाताओं के नाम 2002 या 2003 की मतदाता सूची में नहीं थे, उन्हें अपनी वंशावली साबित करने के लिए दस्तावेज़ प्रस्तुत करने होंगे ताकि यह पुष्टि की जा सके कि उनके पूर्वजों का नाम पुरानी मतदाता सूची में दर्ज था।
याचिकाकर्ताओं ने उठाए थे सवाल
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) और कई प्रमुख राजनीतिक हस्तियों ने इसे अदालत में चुनौती दी थी। उनकी मुख्य आपत्तियां थीं:
अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन: याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि चुनाव आयोग के पास जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत ऐसी गहन जांच करने का अधिकार नहीं है।
नागरिकता पर संशय: इसे एक ‘NRC जैसी’ प्रक्रिया बताया गया, जिसका उद्देश्य नागरिकता की जांच करना माना गया। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि नागरिकता तय करना केवल केंद्र सरकार का काम है, चुनाव आयोग का नहीं।
मतदाताओं के वंचित होने का डर: आलोचकों का मानना था कि गरीब और प्रवासी लोग, जो पुराने दस्तावेज़ जुटाने में अक्षम हैं, वे अपने मताधिकार से वंचित हो जाएंगे।
चुनाव आयोग का पक्ष और कोर्ट का रुख
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना उसका संवैधानिक कर्तव्य है। आयोग ने अनुच्छेद 324 और 326 का हवाला देते हुए कहा कि मृत, डुप्लीकेट और दूसरे स्थान पर जा चुके मतदाताओं को हटाना और विदेशी नागरिकों को सूची से बाहर रखना एक प्रशासनिक आवश्यकता है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि प्रक्रिया आम जनता के लिए कठिन न हो। अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिए थे कि सत्यापन के लिए ‘आधार कार्ड’ जैसे आधुनिक दस्तावेजों को भी पूरी मान्यता दी जाए।
अंतिम फैसला
29 जनवरी 2026 को सुरक्षित रखे गए फैसले को आज सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि:
1. ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) असंवैधानिक नहीं है।
2. मतदाता सूची को दुरुस्त रखने का अधिकार पूर्णतः निर्वाचन आयोग के दायरे में आता है।
3. आयोग द्वारा की गई प्रशासनिक कार्रवाई का उद्देश्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना है।
इस फैसले के साथ ही देश में मतदाता सूची को अपडेट करने को लेकर लंबे समय से चल रहा कानूनी विवाद अब समाप्त हो गया है।


















