Champai Soren Questions: Why Are There Over 5,000 Churches in Jharkhand?

झारखंड में ‘आदिवासी पहचान’ पर छिड़ी नई बहस, चंपाई सोरेन के सवाल, झारखंड में 5,000 से अधिक चर्च क्यों

Champai Soren Questions: Why Are There Over 5,000 Churches in Jharkhand?

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रांची: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता चंपाई सोरेन ने राज्य के सियासी और सामाजिक विमर्श में एक नया और तीखा सवाल खड़ा कर दिया है। सोशल मीडिया के माध्यम से उन्होंने आदिवासी अस्मिता, संस्कृति और धर्म को लेकर जो टिप्पणी की है, उसने प्रदेश में बहस को नई दिशा दे दी है।

क्या है चंपाई सोरेन का सवाल?

चंपाई सोरेन ने अपने पोस्ट में आदिवासियों की मूल पहचान पर केंद्रित सवाल पूछा है। उन्होंने कहा कि झारखंड के आदिवासी मूलतः ‘प्रकृति पूजक’ रहे हैं और उनकी आस्था जल, जंगल और जमीन से जुड़ी है। इस संदर्भ में उन्होंने राज्य में चर्चों की संख्या पर सवाल उठाते हुए लिखा:

जब आदिवासी मूलतः प्रकृति पूजक हैं, तो फिर झारखंड में 5,000 से अधिक चर्च क्यों बनाए गए? क्या वहां आदिवासियों के आराध्य देव मरांग बुरु या सिंगबोंगा की पूजा की जाती है?”

आदिवासी अस्मिता का मुद्दा

चंपाई सोरेन ने अपने तंज के माध्यम से इस बात पर जोर देने का प्रयास किया है कि आदिवासी संस्कृति के संरक्षण के लिए यह जानना जरूरी है कि उनकी पारंपरिक आस्था और पद्धतियां किस हद तक सुरक्षित हैं। उन्होंने ‘मरांग बुरु’ और ‘सिंगबोंगा’ का उल्लेख कर यह संकेत दिया है कि आदिवासियों की मूल धार्मिक परंपराओं को दरकिनार करना उनकी अस्मिता के लिए एक बड़ा प्रश्न है।

सियासी गलियारों में चर्चा

राजनीतिक गलियारों में चंपाई सोरेन का यह बयान महज एक धार्मिक सवाल नहीं है, बल्कि इसके गहरे राजनीतिक मायने भी हैं। राज्य में लंबे समय से ‘सरना धर्म कोड’ की मांग और आदिवासी संस्कृति के संरक्षण का मुद्दा सुर्खियों में रहा है। ऐसे में, चंपाई सोरेन का यह रुख उन मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है, जो अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर बेहद जागरूक हैं।

 

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