A businessman was jailed for 57 days after mistaking spices for drugs; the High Court granted him justice after 16 years.

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: वैधानिक समय सीमा खत्म होने से पहले वाहन की नीलामी गैरकानूनी, राज्य सरकार को 3 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश

A businessman was jailed for 57 days after mistaking spices for drugs; the High Court granted him justice after 16 years.

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रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने वाहन जब्ती और नीलामी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में राज्य सरकार की कार्रवाई को कानून के विपरीत बताते हुए कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को उपलब्ध वैधानिक अपील या पुनरीक्षण (रिवीजन) का अधिकार समाप्त होने से पहले उसके वाहन की नीलामी करना न केवल अवैध है, बल्कि यह संपत्ति के संवैधानिक अधिकार का भी उल्लंघन है। इसी मामले में अदालत ने राज्य सरकार को याचिकाकर्ता को उसका वाहन लौटाने के साथ-साथ तीन लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है।

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मामला बिहार के गया निवासी अशोक सिंह द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया था कि खनन आयुक्त द्वारा 16 मई 2025 को पारित आदेश के बावजूद उनका हाइवा वाहन उन्हें वापस नहीं दिया गया। उनका वाहन वर्ष 2021 में कथित रूप से अवैध कोयला परिवहन के आरोप में जब्त किया गया था, जिसके बाद जब्ती (कन्फिस्केशन) की कार्रवाई शुरू की गई।

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रिकॉर्ड के अनुसार, 25 फरवरी 2023 को उपायुक्त-सह-जिला दंडाधिकारी, लातेहार ने वाहन जब्त करने का आदेश दिया और उसे नीलाम करने का निर्देश दिया। इसके बाद 8 मार्च 2023 को वाहन की नीलामी कर दी गई। हालांकि, कानून के तहत याचिकाकर्ता को इस आदेश के खिलाफ 60 दिनों के भीतर पुनरीक्षण याचिका दायर करने का अधिकार प्राप्त था। याचिकाकर्ता ने 22 मार्च 2023 को समय सीमा के भीतर पुनरीक्षण याचिका भी दायर कर दी थी। बाद में खनन आयुक्त ने याचिका स्वीकार करते हुए वाहन वापस करने का आदेश दिया, लेकिन तब तक वाहन की नीलामी हो चुकी थी।

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सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस बात पर गंभीर सवाल उठाया कि जब कानून किसी व्यक्ति को 60 दिनों तक पुनरीक्षण का अधिकार देता है तो उस अवधि के समाप्त होने से पहले वाहन की नीलामी कैसे की जा सकती है। अदालत ने माना कि राज्य सरकार इस जल्दबाजी का संतोषजनक कारण बताने में असफल रही।

मामले में यह भी सामने आया कि नीलामी के बाद वाहन एक तीसरे व्यक्ति ने खरीद लिया था। बाद में न्यायालय की कार्यवाही के दौरान जिला प्रशासन ने उस खरीदार से वाहन वापस लिया, उसे नीलामी की राशि तथा ब्याज का भुगतान किया और वाहन को सुरक्षित अभिरक्षा में रखा। इसके बाद याचिकाकर्ता को वाहन लेने के लिए भी कहा गया।

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याचिकाकर्ता का कहना था कि वाहन चोरी हो गया था और चोरी के बाद उसका दुरुपयोग किया गया। उनका यह भी तर्क था कि बिना व्यक्तिगत सूचना दिए वाहन की नीलामी कर दी गई, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। दूसरी ओर, नीलामी में वाहन खरीदने वाले हस्तक्षेपकर्ता ने दावा किया कि उसने वाहन को चलने योग्य बनाने में लाखों रुपये खर्च किए हैं और उसे पर्याप्त मुआवजा मिलना चाहिए।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता को नीलामी से पहले व्यक्तिगत नोटिस नहीं दिया गया और वैधानिक अवधि समाप्त होने से पहले वाहन की नीलामी करना पूरी तरह गैरकानूनी था। अदालत ने स्पष्ट किया कि संपत्ति का अधिकार संवैधानिक अधिकार है और किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन किए बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता।

हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता और हस्तक्षेपकर्ता द्वारा अतिरिक्त मुआवजे की मांग तथ्यों की विस्तृत जांच का विषय है, जिसका निर्णय रिट याचिका के दायरे में नहीं किया जा सकता। यदि दोनों पक्ष अधिक मुआवजा चाहते हैं तो वे सक्षम न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

अंत में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि दो सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को उसका वाहन सौंपा जाए और अवैध कार्रवाई से हुई परेशानी के लिए तीन लाख रुपये का मुआवजा भी दिया जाए। साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता या हस्तक्षेपकर्ता अतिरिक्त क्षतिपूर्ति चाहते हैं तो वे सक्षम न्यायालय में अलग से दावा कर सकते हैं।

 

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