A businessman was jailed for 57 days after mistaking spices for drugs; the High Court granted him justice after 16 years.

JPSC भर्ती रद्द करने के फैसले में कहां रह गई कमी? हाईकोर्ट की टिप्पणियों से सामने आए बड़े सवाल

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A businessman was jailed for 57 days after mistaking spices for drugs; the High Court granted him justice after 16 years.

रांची। झारखंड में JPSC 2023 की भर्ती प्रक्रिया को रद्द करने के राज्य सरकार के फैसले पर हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश ने कई गंभीर कानूनी सवाल खड़े कर दिए हैं। 20 अगस्त 2026 को पारित आदेश में हाईकोर्ट ने सरकार की 18 अगस्त की अधिसूचना के अमल पर रोक लगाते हुए प्रथम दृष्टया माना कि नियमित नियुक्तियों को समाप्त करने से पहले प्राकृतिक न्याय और उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाना जरूरी था।

अदालत की टिप्पणियों से यह संकेत मिलता है कि सरकार की कार्रवाई में केवल भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप ही मुद्दा नहीं बने, बल्कि पूरी नियुक्ति रद्द करने के तरीके और उसके आधार पर भी सवाल उठे हैं।

1. नियमित नियुक्तियां अचानक कैसे खत्म कर दी गईं?

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि Advertisement No. 01/2024 के तहत वे विधिवत नियुक्त हुए थे। इसके बावजूद 18 अगस्त की अधिसूचना के जरिए पूरी भर्ती को रद्द कर उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।

हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया कहा कि किसी नियमित नियुक्ति को इस तरह समाप्त करने से पहले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन होना चाहिए। यानी प्रभावित कर्मचारियों को अपनी बात रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए।

यही बिंदु सरकार के फैसले की सबसे बड़ी कानूनी कमजोरी के रूप में सामने आया है।

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2. सरकार के आदेश में ऐसा कौन-सा ठोस आधार था?

कोर्ट ने अपने आदेश में बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि चुनौती दिए गए आदेश में ऐसे पर्याप्त सामग्री का प्रतिबिंब नहीं है, जिससे उठाए गए इस तरह के कठोर कदम को उचित ठहराया जा सके।

सरल शब्दों में कहें तो अदालत यह देख रही है कि अगर पूरी भर्ती और नियुक्तियां रद्द करने जैसा बड़ा फैसला लिया गया, तो उसके पीछे मौजूद ठोस तथ्य और सामग्री सरकारी अधिसूचना में पर्याप्त रूप से दिखाई क्यों नहीं देती।

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पूरी भर्ती प्रक्रिया को खत्म करने का असर सिर्फ आरोपित लोगों पर नहीं, बल्कि उन अभ्यर्थियों पर भी पड़ा जो चयन प्रक्रिया पूरी करने के बाद नियुक्त हो चुके थे।

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3. जांच चल रही थी, फिर पूरी नियुक्ति रद्द करने की जरूरत क्यों पड़ी?

सरकार की ओर से अदालत में बताया गया कि विभिन्न नागरिकों की शिकायतों और आरोपों के आधार पर CID की जांच शुरू हो चुकी है और कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं।

लेकिन अदालत ने यह भी दर्ज किया कि Investigating Agency पहले से कार्रवाई कर रही है।

यहीं से एक बड़ा सवाल पैदा होता है—जब जांच एजेंसी मामले की जांच कर रही थी, तो जांच के अंतिम निष्कर्ष से पहले ही पूरी भर्ती और नियुक्तियों को खत्म करने का फैसला क्यों लिया गया?

कोर्ट ने इसी परिस्थिति को देखते हुए सरकार की कार्रवाई को प्रथम दृष्टया कठोर कदम माना है।

4. ‘मास बंगलिंग’ का आरोप, लेकिन कार्रवाई का आधार कितना स्पष्ट?

सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि भर्ती प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई थी और इसी कारण पूरी नियुक्ति रद्द करना उचित था।

लेकिन अदालत ने फिलहाल इस दलील को अंतिम रूप से स्वीकार नहीं किया है। इसके उलट कोर्ट ने कहा है कि नियमित नियुक्ति को समाप्त करने के लिए प्राकृतिक न्याय का पालन जरूरी है और मौजूदा आदेश में कठोर कार्रवाई को सही ठहराने वाली पर्याप्त सामग्री दिखाई नहीं देती।

इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत ने भर्ती में गड़बड़ी के आरोपों को गलत घोषित कर दिया है। मामले की जांच और अंतिम न्यायिक फैसला अभी बाकी है।

5. सरकार से मांगा गया जवाब भी महत्वपूर्ण

हाईकोर्ट ने सरकार के अधिवक्ताओं को जांच और उससे जुड़े आगे के घटनाक्रम के संबंध में विस्तृत counter-affidavit दाखिल करने का निर्देश दिया है।

अगली सुनवाई 15 सितंबर 2026 को दोपहर 2:30 बजे होगी।

इस सुनवाई में सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि भर्ती रद्द करने के पीछे क्या ठोस सामग्री थी, जांच किस स्तर तक पहुंची है और नियुक्त कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त करने के फैसले के लिए अपनाई गई प्रक्रिया क्या थी।

हाईकोर्ट के आदेश का तत्काल प्रभाव यह है कि 18 अगस्त 2026 की अधिसूचना का संचालन और क्रियान्वयन अगले आदेश तक स्थगित रहेगा।

अदालत ने संबंधित विभाग को यह भी निर्देशित किया है कि याचिकाकर्ताओं के साथ-साथ समान रूप से प्रभावित अन्य लोगों को भी रिट याचिका के निपटारे तक काम जारी रखने दिया जाए।

हालांकि, सभी याचिकाकर्ताओं को यह undertaking/affidavit देना होगा कि संबंधित आपराधिक मामले में ट्रायल कोर्ट का अंतिम फैसला उनके लिए बाध्यकारी होगा और सरकार कानून के अनुसार उचित कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगी।

सरकार के फैसले पर अब सबसे बड़ा सवाल

हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश से फिलहाल यह तस्वीर सामने आती है कि सरकार के पास भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी की जांच कराने का आधार हो सकता है, लेकिन पूरी नियुक्ति को खत्म करने की प्रक्रिया और उसके लिए प्रस्तुत आधार पर अदालत ने प्रथम दृष्टया सवाल उठाए हैं।

यानी विवाद अब केवल यह नहीं रह गया है कि भर्ती में गड़बड़ी हुई या नहीं। बड़ा कानूनी सवाल यह भी है कि अगर गड़बड़ी हुई थी तो उसका असर किन लोगों पर था और निर्दोष रूप से चयनित एवं नियुक्त अभ्यर्थियों की नियुक्ति खत्म करने से पहले सरकार ने उन्हें सुनवाई का मौका क्यों नहीं दिया।

जाहिर है अब 15 सितंबर की अगली सुनवाई में सरकार का जवाब इस पूरे मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है।

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