अधूरी दीवारों में 80 साल की मां का आखिरी सपना, अपनी मिट्टी में एक छत की उम्मीद, जमीन विवाद में अटका आशियाना

शंभू कुमार सिंह
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!सिमडेगा: खूंटीटोली गांव में खड़ी अधूरी दीवारें महज एक मकान की कहानी नहीं कहतीं, बल्कि 80 वर्षीय निर्मला मुक्ता के संघर्ष और अपनी जन्मभूमि में आखिरी आशियाना बनाने की उनकी उम्मीद को बयां करती हैं। स्थानीय मिट्टी से तैयार कंप्रेस्ड इंटरलॉकिंग अर्थ ब्लॉक्स से बन रहा उनका घर पारिवारिक विवाद और कानूनी प्रक्रिया के कारण अधूरा पड़ा है।

दिल्ली विकास प्राधिकरण से सेवानिवृत्त निर्मला मुक्ता कवयित्री और तीन बच्चों की मां हैं। जीवन में दो बार मौत को मात देने के बाद स्वास्थ्य लाभ के लिए उन्होंने अपने दिवंगत पति की पैतृक भूमि पर प्रकृति की गोद में लौटकर गांव में रहने का फैसला किया। करीब तीन वर्षों की प्रशासनिक प्रक्रिया के बाद उन्हें भूमि पर अधिकार मिला।

मां की इच्छा और संघर्ष को देखते हुए दिल्ली में रहने वाले उनके आर्किटेक्ट बेटे ने पर्यावरण-अनुकूल तकनीक से घर का निर्माण शुरू कराया। निर्माण स्थल पर ही स्थानीय मिट्टी से इंटरलॉकिंग अर्थ ब्लॉक्स तैयार किए गए। हालांकि, निर्माण के दौरान बेटी की ओर से कानूनी आपत्ति और दीवानी मुकदमा दायर किए जाने के बाद निर्माण कार्य रुक गया।
अब मामला पैतृक आदिवासी भूमि, पारंपरिक उत्तराधिकार और छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) से जुड़े कानूनी सवालों के बीच अदालत में विचाराधीन है। परिवार के बीच संपत्ति के अधिकार और बंटवारे को लेकर विवाद चल रहा है।

अधूरी दीवारों के बीच खड़ी 80 वर्षीय निर्मला मुक्ता की सबसे बड़ी चाहत संपत्ति या धन नहीं, बल्कि अपनी जन्मभूमि में सम्मान के साथ एक छत के नीचे जीवन बिताना है। उनके लिए यह मकान ईंट-पत्थरों से बनी संरचना से कहीं अधिक है—यह जीवन के अंतिम पड़ाव में अपने घर लौटने का सपना है।
अब उनकी यह उम्मीद अदालत के फैसले पर टिकी है। खूंटीटोली की यह कहानी एक बड़ा सवाल भी छोड़ती है—क्या पैतृक धरोहर सिर्फ जमीन की कीमत है, या उसमें किसी बुजुर्ग के जीवन की आखिरी छत का अधिकार भी शामिल है?
















