लोहरदगा : 26 साल से बदहाल सड़क: छह किलोमीटर के रास्ते ने हजारों ग्रामीणों की जिंदगी की बढ़ाई मुश्किलें
आनंद कुमार सोनी /लोहरदगा
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!लोहरदगा: कुडू प्रखंड के चांपी से धौरा तक करीब छह किलोमीटर लंबी सड़क पिछले 26 वर्षों से बदहाली का शिकार है। ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 2000 में एकीकृत बिहार के समय सड़क का निर्माण हुआ था, लेकिन उसके बाद इसकी मरम्मत या पुनर्निर्माण की दिशा में गंभीर पहल नहीं हुई। अब सड़क की हालत ऐसी है कि पैदल चलना और दोपहिया वाहन से गुजरना भी मुश्किल हो गया है।
चांपी से धौरा के बीच चांपी, कुंदगदा, डूमरटोली, बहराटोली, चुंदपतरा टोली, सलगी, जोगाटोली और धौरा समेत कई गांव व टोले बसे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इन गांवों की करीब 5 से 7 हजार की आबादी रोजमर्रा के आवागमन के लिए इसी मार्ग पर निर्भर है। सड़क खराब होने से स्कूली बच्चों, किसानों, मजदूरों, दुकानदारों और अन्य ग्रामीणों को लगातार परेशानी उठानी पड़ रही है।

स्कूल से अस्पताल तक पहुंचना मुश्किल
ग्रामीणों के मुताबिक इसी मार्ग पर स्कूल, स्वास्थ्य उपकेंद्र, चर्च, मंदिर, सरना स्थल और हाट-बाजार जैसे महत्वपूर्ण स्थान हैं। सड़क की जर्जर स्थिति के कारण इन स्थानों तक पहुंचना भी चुनौती बन गया है। ग्रामीणों का दावा है कि सड़क निर्माण की मांग कई बार जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के सामने रखी गई, लेकिन वर्षों बाद भी स्थिति जस की तस है।
सर्पदंश के मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो रहा रास्ता
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की खराब स्थिति का सबसे गंभीर असर आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है। पिछले दिनों सर्पदंश के चार मामलों में लोगों की मौत होने का दावा ग्रामीणों ने किया है। उनका आरोप है कि धौरा से लोहरदगा अस्पताल तक मरीजों को ले जाने में खराब सड़क के कारण काफी समय लग गया और समय पर इलाज नहीं मिल सका।

जौरा में एंबुलेंस तक नहीं पहुंचती
धौरा राजस्व गांव के अंतर्गत आने वाले जौरा गांव की स्थिति और गंभीर बताई जा रही है। धौरा से करीब 3-4 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव की आबादी लगभग 200 से 250 है। ग्रामीणों के अनुसार सड़क की सुविधा नहीं होने के कारण एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती।
सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं को प्रसव के दौरान होती है। ग्रामीणों के मुताबिक प्रसव पीड़ा शुरू होने पर महिला को खाट या डोला के सहारे मुख्य सड़क तक लाना पड़ता है, जहां से वाहन की व्यवस्था कर अस्पताल ले जाया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि जनता दरबार में भी कई बार इस समस्या को उठाया गया, लेकिन अब तक ठोस समाधान नहीं हुआ।
कभी था सड़क मार्ग, अब कच्चे रास्ते पर निर्भरता
ग्रामीण बताते हैं कि वर्ष 1983 में जौरा क्षेत्र से लेटराइट डालमिया सीमेंट फैक्ट्री, डेहरी तक भेजा जाता था और उस समय यहां सड़क मार्ग उपलब्ध था। समय के साथ यह मार्ग खत्म होता गया और अब ग्रामीणों को कच्चे रास्ते के सहारे आवागमन करना पड़ रहा है।
असनापानी के 84 परिवार भी सड़क से वंचित
धौरा से आगे अंतिम छोर पर स्थित असनापानी गांव में भी पक्की सड़क का अभाव है। धौरा से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर इस गांव में लगभग 84 परिवार रहते हैं। ग्रामीणों के अनुसार आज तक गांव को पक्की सड़क से नहीं जोड़ा गया है और बारिश समेत अन्य मौसम में आवागमन और भी कठिन हो जाता है।
आंदोलन की चेतावनी
सामाजिक विचार मंच के संयोजक कवलजीत सिंह ने कहा कि जिला प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और राज्य सरकार को इस समस्या पर तत्काल ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि हजारों ग्रामीण छह किलोमीटर सड़क के लिए 26 वर्षों से इंतजार कर रहे हैं। यह व्यवस्था के लिए गंभीर सवाल है।
उन्होंने बताया कि समस्या को लेकर मुख्यमंत्री, राज्यपाल, जिला प्रशासन और संबंधित जनप्रतिनिधियों को पत्र भेजकर सड़क निर्माण की मांग की जाएगी। इसके बावजूद पहल नहीं होने पर ग्रामीणों के साथ मिलकर आंदोलन शुरू करने की चेतावनी दी गई है।
















