गुरु मां रुपी सोरेन की याद में पूर्व मंत्री दुलाल भुइयां ने परिवार संग रखा उपवास, बोले- उनका स्नेह जीवन भर नहीं भूल पाऊंगा
जमशेदपुर। गुरु मां रुपी सोरेन के निधन से झारखंड के पूर्व मंत्री और भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य दुलाल भुइयां दुखी हैं। करीब तीन दशक तक झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) से जुड़े रहे दुलाल भुइयां के लिए रुपी सोरेन केवल एक राजनीतिक परिवार की सदस्य नहीं थीं, बल्कि मां की तरह स्नेह और अपनापन देने वाली शख्सियत थीं। उनके निधन से आहत दुलाल भुइयां ने गुरुवार को अपने पूरे परिवार के साथ उपवास रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
18 साल की उम्र से जुड़ी हैं स्नेह की यादें
शुक्रवार को पुरानी यादों को साझा करते हुए दुलाल भुइयां भावुक हो गए। उन्होंने बताया कि जब वह महज 18 वर्ष की उम्र में दुमका जाया करते थे, तब गुरु मां रुपी सोरेन उन्हें बिना भोजन कराए वापस नहीं जाने देती थीं। रास्ते के खर्च के लिए भी वह उन्हें पैसे देती थीं। उनका व्यवहार अपने बच्चों जैसा था। दुलाल भुइयां के मुताबिक, गुरु मां का यही स्नेह उनके दिल में हमेशा के लिए बस गया।
झारखंड आंदोलन के दिनों को किया याद
पूर्व मंत्री ने झारखंड अलग राज्य आंदोलन के दौर को याद करते हुए बताया कि वह भी आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल थे। उस समय शैलेंद्र महतो, आस्तिक महतो और चंपई सोरेन समेत कई लोग आंदोलन में जुटे हुए थे।
उन्होंने बताया कि उस दौर में उनके पास हरे रंग की जीप हुआ करती थी, जिसका नंबर डीएलवी 6262 था। उन्होंने इस जीप को आज भी संभालकर रखा है। उनके लिए यह वाहन केवल एक जीप नहीं, बल्कि झारखंड आंदोलन के संघर्ष और उससे जुड़ी पुरानी यादों की निशानी है।
गुरु शिबू सोरेन और रुपी सोरेन से मिलता था अपनापन
दुलाल भुइयां ने कहा कि जब भी वह दिशोम गुरु शिबू सोरेन और गुरु मां रुपी सोरेन से मिलने जाते थे, उन्हें हमेशा स्नेह और सम्मान मिलता था। गुरु मां का मातृत्व भरा व्यवहार आज भी उनकी स्मृतियों में जीवित है।
भावुक होते हुए उन्होंने कहा कि जिस मां ने उन्हें हमेशा अपने बच्चों की तरह प्यार दिया, उनके स्नेह को वह जीवन भर नहीं भूल पाएंगे।
अंतिम दर्शन नहीं कर पाने की कसक
दुलाल भुइयां ने इस बात पर भी दुख जताया कि चाहने के बावजूद वह गुरु मां रुपी सोरेन के अंतिम दर्शन और अंतिम विदाई में शामिल नहीं हो सके। उन्होंने इस संबंध में अपनी उपेक्षा का जिक्र करते हुए पीड़ा व्यक्त की। उनके मुताबिक, अंतिम विदाई में शामिल नहीं हो पाने की कसक उनके मन में हमेशा बनी रहेगी। इसी दुख और कृतज्ञता के भाव के साथ उन्होंने जमशेदपुर में अपने परिवार के साथ उपवास रखा। उनके लिए यह उपवास महज शोक व्यक्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि उस ममता और अपनापन के प्रति श्रद्धांजलि थी, जो उन्हें जीवन के शुरुआती दिनों से मिलता रहा था।

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