अरावली पहाड़ियों की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अपने ही आदेश पर लगाई रोक, नई विशेषज्ञ समिति गठित करने का प्रस्ताव

अरावली पहाड़ियों की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अपने ही आदेश पर लगाई रोक, नई विशेषज्ञ समिति गठित करने का प्रस्ताव

अरावली पहाड़ियों की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अपने ही आदेश पर लगाई रोक, नई विशेषज्ञ समिति गठित करने का प्रस्ताव

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Group Join Now
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!

अरावली पहाड़ियों की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अपने ही आदेश पर लगाई रोक, नई विशेषज्ञ समिति गठित करने का प्रस्ताव

नई दिल्ली, 29 दिसंबर सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं की परिभाषा से जुड़े विवादास्पद मामले में बड़ा कदम उठाते हुए अपने 20 नवंबर 2025 के आदेश पर रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अगुवाई वाली अवकाश पीठ ने स्वत: संज्ञान (सुओ मोटो) लेते हुए मामले की सुनवाई की और कहा कि परिभाषा में कुछ अस्पष्टताएं हैं, जो अनियंत्रित खनन का खतरा पैदा कर सकती हैं।पीठ ने प्रस्ताव रखा कि डोमेन एक्सपर्ट्स की एक हाई-पावर्ड समिति गठित की जाए, जो पूरे मुद्दे की गहन जांच करेगी। केंद्र सरकार और संबंधित राज्यों (दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात) को नोटिस जारी किया गया है। अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को होगी। फिलहाल, 20 नवंबर के आदेश और कमेटी की सिफारिशें स्थगित रहेंगी, तथा यथास्थिति बरकरार रहेगी।

क्या था 20 नवंबर का आदेश?

20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों को स्वीकार किया था। इसके तहत:अरावली हिल: स्थानीय जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली कोई भी भूमि रूप।
अरावली रेंज: दो या अधिक ऐसी पहाड़ियां जो एक-दूसरे से 500 मीटर के दायरे में हों।

इस परिभाषा से आशंका थी कि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली छोटी पहाड़ियां और उनके बीच के क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो जाएंगे, जिससे खनन और निर्माण गतिविधियां बढ़ सकती हैं। पर्यावरणविदों का कहना था कि राजस्थान में 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 ही इस मानदंड पर खरी उतरती हैं, जिससे अरावली का बड़ा हिस्सा खतरे में पड़ जाता।

अरावली क्यों महत्वपूर्ण?

अरावली विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो दिल्ली से गुजरात तक फैली हुई है। यह थार मरुस्थल को पूर्व की ओर फैलने से रोकती है, भूजल रिचार्ज करती है, जैव विविधता का केंद्र है और दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अवैध खनन से पहले से ही इसका बड़ा हिस्सा नष्ट हो चुका है।

प्रतिक्रियाएं

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव: फैसले का स्वागत किया और कहा कि सरकार अरावली संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है। मंत्रालय नई समिति को पूरा सहयोग देगा।
कांग्रेस: फैसले को “उम्मीद की किरण” बताया। जयराम रमेश ने कहा कि मोदी सरकार की परिभाषा बदलने की कोशिश खनन और रियल एस्टेट को बढ़ावा देने की थी।
पर्यावरणविद: इसे बड़ी राहत बताया, लेकिन अंतिम फैसले तक सतर्क रहने की अपील की।

नई और ताज़ा खबरों के लिए जुड़े रहें — Drishti Now