बंदूक की जगह किताब: टुंडी के नक्सल प्रभावित गांवों के 100 से अधिक बच्चों को मिला शिक्षा का सहारा, धनबाद में चल रहा निःशुल्क आवासीय स्कूल
धनबाद। कभी नक्सल प्रभाव और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझने वाले टुंडी के सुदूर गांवों के 100 से अधिक बच्चों के लिए धनबाद शहर में शिक्षा की नई राह खुली है। मानियाडीह और आसपास के नक्सल प्रभावित गांवों के इन बच्चों को धनबाद के जगजीवन नगर स्थित एक निःशुल्क आवासीय स्कूल में पढ़ाई और रहने की सुविधा दी जा रही है। इस पहल का उद्देश्य बच्चों को शिक्षा से जोड़कर उनके बेहतर भविष्य की नींव तैयार करना है। इस पहल की शुरुआत धनबाद निवासी कृष्णा नंदन सिन्हा और उनके चार सहयोगियों ने की है। इनमें तीन महिलाएं भी शामिल हैं, जो अपना काफी समय बच्चों की पढ़ाई और देखभाल में लगा रही हैं। बीसीसीएल के खाली पड़े क्वार्टर में संचालित इस स्कूल में बच्चों को शिक्षा के साथ भोजन, कपड़े और रहने की सुविधा भी मुफ्त उपलब्ध कराई जा रही है।

40 किलोमीटर दूर से शिक्षा की तलाश में पहुंचे बच्चे
टुंडी प्रखंड के मानियाडीह और आसपास के गांव धनबाद शहर से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित हैं। इन इलाकों में लंबे समय से बुनियादी सुविधाओं की कमी और नक्सल प्रभाव जैसी चुनौतियां रही हैं। ऐसे माहौल में बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल करना आसान नहीं है।
स्कूल प्रबंधन के मुताबिक, यहां आने वाले कई बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। कुछ परिवारों के लिए बच्चों की पढ़ाई, भोजन और आवास का खर्च उठाना मुश्किल है। ऐसे बच्चों को ध्यान में रखकर धनबाद में निःशुल्क आवासीय शिक्षा की व्यवस्था की गई है।

जमीन बेचकर खड़ा किया शिक्षा का मिशन
इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए संस्थापक कृष्णा नंदन सिन्हा और उनके सहयोगियों ने आर्थिक रूप से बड़ा योगदान दिया है। बताया जाता है कि इस काम के लिए उन्होंने अपनी पुश्तैनी जमीन तक बेच दी। कृष्णा नंदन सिन्हा का निजी स्कूल भी है, जहां चलने वाली दो वैन से होने वाली आय का इस्तेमाल इस सामाजिक पहल में किया जाता है। स्कूल से जुड़ी महिला सहयोगी भी सुबह से शाम तक बच्चों की पढ़ाई और देखभाल में जुटी रहती हैं। बच्चों के रहने, खाने और शिक्षा पर होने वाले खर्च का बड़ा हिस्सा संस्थापक और सहयोगी स्वयं वहन करते हैं।

नाश्ते से लेकर रात के भोजन तक की व्यवस्था
स्कूल में बच्चों के पोषण का भी ध्यान रखा जाता है। प्रबंधन की ओर से निर्धारित भोजन व्यवस्था के तहत बच्चों को सुबह नाश्ते में पूरी, सब्जी, खीर और फल दिए जाते हैं। दोपहर में चावल, दाल, सब्जी और पापड़, जबकि शाम को उबला चना, हरा मूंग और गुड़ दिया जाता है। रात के भोजन में रोटी, सब्जी और हलवा शामिल हैं। इसके अलावा बच्चों को कॉपी-किताब, स्कूल ड्रेस और आवास की सुविधा भी निःशुल्क दी जाती है। इस व्यवस्था में बीसीसीएल की ओर से उपलब्ध कराए गए खाली क्वार्टर का इस्तेमाल किया जा रहा है।

बच्चों की शिक्षा के सामने सुरक्षा की चुनौती
स्कूल प्रबंधन ने परिसर में तोड़फोड़ और माहौल बिगाड़ने की कोशिशों का आरोप लगाया है। संचालकों का कहना है कि कुछ असामाजिक तत्व इस स्कूल को बंद कराने की कोशिश कर रहे हैं। इस संबंध में प्रबंधन ने जिला प्रशासन और पुलिस से सुरक्षा और सहयोग की मांग की है। स्कूल संचालकों के मुताबिक, आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद बच्चों की पढ़ाई जारी रखना उनकी प्राथमिकता है। ऐसे में परिसर की सुरक्षा और प्रशासनिक सहयोग इस पहल को जारी रखने के लिए महत्वपूर्ण है।

शिक्षा से बदल सकती है गांवों की तस्वीर
नक्सल प्रभावित और पिछड़े इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसरों का विस्तार विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। टुंडी के गांवों से आए इन बच्चों को शहर में शिक्षा और सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने की यह पहल इसी सोच को आगे बढ़ाती है। हालांकि, इस तरह की पहलों को लंबे समय तक जारी रखने के लिए आर्थिक सहयोग, संस्थागत समर्थन और प्रशासनिक निगरानी भी जरूरी है। समाज और प्रशासन का सहयोग मिले तो ये बच्चे आगे चलकर अपने गांवों और समुदायों के विकास में अहम भूमिका निभा सकते हैं। धनबाद के जगजीवन नगर में चल रही यह पहल एक संदेश देती है कि बच्चों के भविष्य को बदलने की शुरुआत शिक्षा से होती है। बंदूक और हिंसा के बजाय किताब और कलम को प्राथमिकता देने का यह प्रयास तभी व्यापक बदलाव ला सकेगा, जब इसे निरंतर सहयोग और सुरक्षा मिलेगी।

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