39 साल पुराने 200 रुपये रिश्वत मामले में झारखंड हाईकोर्ट का फैसला, धनबाद के भोलू मंडल को मिली राहत

रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने करीब चार दशक पुराने रिश्वत मामले में दोषी ठहराए गए धनबाद के बसंतीमाता कोलियरी के कर्मचारी भोलू मंडल को बड़ी राहत दी है। अदालत ने कहा कि भ्रष्टाचार के किसी भी मामले में केवल रिश्वत की रकम बरामद होना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। जब तक रिश्वत मांगने का आरोप ठोस साक्ष्यों से साबित न हो, तब तक दोषसिद्धि नहीं की जा सकती। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने वर्ष 2002 में सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए भोलू मंडल को बरी कर दिया।
जस्टिस अरुण कुमार राय की एकल पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष रिश्वत मांगने का आरोप संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं हुआ। इसलिए ट्रायल कोर्ट का फैसला कानून की कसौटी पर टिक नहीं पाया।

शिकायतकर्ता का बयान नहीं हो सका, गवाह भी पलटा
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि शिकायतकर्ता सुखलाल दास की मुकदमे की कार्यवाही के दौरान मृत्यु हो गई थी, जिसके कारण उनका बयान अदालत में दर्ज नहीं हो सका। इसके अलावा सीबीआई द्वारा पेश किया गया एक स्वतंत्र गवाह भी अपने पहले दिए गए बयान से मुकर गया।
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि सीबीआई अधिकारियों और अन्य गवाहों के बयानों में रिश्वत मांगने की घटना को लेकर कई अहम विरोधाभास मौजूद थे। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून के मामलों में रिश्वत की मांग साबित होना सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। केवल रिश्वत की रकम मिलने या बरामद होने से किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
1987 में दर्ज हुआ था मामला
यह मामला वर्ष 1987 का है। शिकायतकर्ता सुखलाल दास ने आरोप लगाया था कि उनकी पत्नी के निधन के बाद भविष्य निधि (पीएफ) और ग्रेच्युटी की राशि जारी करने के एवज में भोलू मंडल ने 200 रुपये और एक अन्य कर्मचारी डब्ल्यू.एच. खान ने 300 रुपये रिश्वत मांगी थी।
शिकायत मिलने के बाद सीबीआई ने ट्रैप की कार्रवाई की और 16 दिसंबर 1987 को दोनों कर्मचारियों को कथित रूप से रिश्वत लेते हुए पकड़ने का दावा किया। जांच एजेंसी ने भोलू मंडल के पास से 200 रुपये तथा डब्ल्यू.एच. खान के पास से 300 रुपये बरामद करने की बात कही थी। इसके बाद दोनों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई।
20 साल बाद सजा, अब हाईकोर्ट ने पलटा फैसला
लंबी सुनवाई के बाद वर्ष 2002 में सीबीआई की विशेष अदालत ने भोलू मंडल को दोषी ठहराते हुए दो साल के कारावास और 300 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इस फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की गई।
अपील पर फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत मांगने का आवश्यक आरोप साबित नहीं कर पाया। ऐसे में दोषसिद्धि का आधार कमजोर हो जाता है। इसी वजह से विशेष अदालत का फैसला निरस्त करते हुए भोलू मंडल को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।
















