Kanwar Yatra: Mythological Story, History, and the Significance of Offering Gangajal to Lord Shiva

कांवड़ यात्रा: क्या है पौराणिक कहानी, इतिहास और भगवान शिव पर गंगाजल चढ़ाने का रहस्य

Kanwar Yatra: Mythological Story, History, and the Significance of Offering Gangajal to Lord Shiva
Kanwar Yatra: Mythological Story, History, and the Significance of Offering Gangajal to Lord Shiva

हर साल श्रावण मास में देशभर में करोड़ों शिवभक्त कांवड़ यात्रा पर निकलते हैं। केसरिया वस्त्र पहने, नंगे पांव सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय करते हुए वे गंगाजल भरकर अपने स्थानीय शिव मंदिरों या प्रसिद्ध धामों में जलाभिषेक करते हैं। ‘बम बम भोले’ और ‘हर हर महादेव’ के जयकारों से गूंजते रास्ते आस्था का अनूठा मेल दिखाते हैं। लेकिन यह यात्रा कब शुरू हुई, इसकी कहानी क्या है और भगवान शिव पर विशेष रूप से गंगाजल ही क्यों चढ़ाया जाता है? आइए जानते हैं।

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Deoghar
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समुद्र मंथन से शुरू हुई कहानी

कांवड़ यात्रा की सबसे प्रचलित पौराणिक कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है। जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीरसागर का मंथन किया, तो सबसे पहले हलाहल नामक भयंकर विष निकला। इस विष की ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे। सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने वह विष पी लिया और उसे अपने कंठ में रोक लिया। इससे उनका गला नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए।

विष की गर्मी और जलन से शिव जी पीड़ित हो गए। तब देवताओं, ऋषियों और भक्तों ने उन्हें पवित्र गंगाजल अर्पित कर शीतलता प्रदान की। इसी घटना को स्मरण करते हुए आज भी शिवभक्त गंगाजल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। मान्यता है कि सावन मास में ही यह घटना हुई थी, इसलिए यही महीना शिव पूजा और कांवड़ यात्रा के लिए सबसे शुभ माना जाता है।

कौन था पहला कांवड़िया?

पौराणिक मान्यताओं में कई नाम मिलते हैं:
भगवान परशुराम: कई कथाओं के अनुसार परशुराम ने गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लेकर बागपत (उत्तर प्रदेश) के पुरा महादेव मंदिर में शिवलिंग का अभिषेक किया। उन्हें पहला कांवड़िया माना जाता है।
लंकापति रावण: शिव के परम भक्त रावण ने भी कांवड़ में गंगाजल भरकर पुरा महादेव या अन्य स्थानों पर जलाभिषेक किया। विष के प्रभाव से शिव को राहत दिलाने का श्रेय उन्हें दिया जाता है।
भगवान श्रीराम: कुछ मान्यताओं के अनुसार राम ने सुल्तानगंज (बिहार) से गंगाजल लेकर देवघर के बैद्यनाथ धाम में अभिषेक किया।
श्रवण कुमार: त्रेता युग में श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार ले जाकर गंगा स्नान कराया और जल वापस लाए। यह सेवा का प्रतीक माना जाता है।

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ये सभी कथाएँ त्रेता युग या उससे पहले की हैं। ऐतिहासिक रूप से विद्वान बताते हैं कि व्यवस्थित कांवड़ यात्रा का रूप 18वीं शताब्दी के आसपास सुल्तानगंज से देवघर की यात्रा से विकसित हुआ। 20वीं शताब्दी, खासकर 1980 के दशक के बाद, बेहतर सड़कें, भक्ति संगीत और जन जागरण के कारण यह विशाल जन-आंदोलन बन गई।

भगवान शिव पर गंगाजल ही क्यों?

भागीरथ की तपस्या से गंगा पृथ्वी पर आईं। उनके वेग से धरती नष्ट न हो, इसलिए शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण किया। गंगा शिव की जटाओं से निकलकर पृथ्वी पर बहती हैं, इसलिए उनका जल शिव को सर्वाधिक प्रिय है। समुद्र मंथन की कथा के अनुसार गंगाजल ने शिव के शरीर की गर्मी को कम किया।

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शिव पुराण और अन्य ग्रंथों में जलाभिषेक को शिव की सर्वश्रेष्ठ उपासना बताया गया है। दूध, दही, घी, बेलपत्र और भांग के साथ गंगाजल चढ़ाने से भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और पापों से मुक्ति मिलती है। आज कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव भी है। लाखों युवा, महिलाएँ और बुजुर्ग इसमें शामिल होते हैं। हरिद्वार, गंगोत्री, गौमुख और सुल्तानगंज से जल लिया जाता है। कांवड़ (बांस की डंडी पर दो बर्तन) को कंधे पर रखकर चलना त्याग, अनुशासन और भक्ति का प्रतीक है।

कांवड़ यात्रा आस्था, तपस्या और शिवभक्ति का जीवंत प्रमाण है। समुद्र मंथन से लेकर आज तक यह परंपरा बताती है कि सृष्टि की रक्षा के लिए शिव ने जो त्याग किया, उसी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का यह अनोखा तरीका है। हर हर महादेव!

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