बारात में नाचती रही ‘ममता वाहन’ बाइक पर सिसकती रही जिंदगी: DC रवि आनंद ने दिए जांच के आदेश
बारात में नाचती रही ‘ममता वाहन, बाइक पर सिसकती रही जिंदगी: DC रवि आनंद ने दिए जांच के आदेश
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नवीन कुमार
चतरा: उस रात चाँदनी तो थी, लेकिन चतरा जिले के कुन्दा प्रखंड के टिकुलियाटांड़ गांव में अंधेरा पसरा था। यह अंधेरा बिजली का नहीं, बल्कि सिस्टम की संवेदनहीनता का था। संजू देवी प्रसव की उस असहनीय पीड़ा से गुजर रही थीं, जिसे ‘दूसरा जन्म’ कहा जाता है। हर चीख के साथ उम्मीद थी कि सरकारी ‘ममता वाहन’ आएगा और उसे सुरक्षित अस्पताल ले जाएगा।
लेकिन विडंबना देखिए, जिस गाड़ी को एक माँ की ममता बचाने के लिए बनाया गया था, वह किसी शादी की बारात में खुशियां ढो रही थी। फोन पर मिला वह पत्थर जैसा जवाब— “गाड़ी बारात में गई है, खुद इंतजाम कर लो —सिर्फ एक जवाब नहीं था, बल्कि उस गरीब परिवार की उम्मीदों पर किया गया कड़ा प्रहार था।
मजबूरी का सफर:
जब सरकारी सिस्टम ने हाथ खड़े कर दिए, तो एक देवर ने अपनी जान की बाजी लगा दी। पथरीली सड़कें, आधी रात का सन्नाटा और बाइक पर पीछे बैठी दर्द से तड़पती एक गर्भवती महिला। सोचिए, उस सड़क के हर गड्ढे ने संजू के शरीर को कितना तोड़ा होगा, लेकिन उसके मन में अपने होने वाले बच्चे को बचाने की जिद शायद उस शारीरिक दर्द से कहीं बड़ी थी। जब वे अस्पताल पहुँचे, तो वहां की खामोशी और दरवाजों पर लटके ताले डराने वाले थे। खुद दरवाजा खोलकर अंदर जाना, मानों न्याय के लिए बंद दरवाजों को धक्का देने जैसा था।
DC रवि आनंद: व्यवस्था के अंधेरे में उम्मीद का दीया
इस पूरी कहानी में जब मानवता हारती दिख रही थी, तब चतरा के उपायुक्त रवि आनंद एक रक्षक बनकर सामने आए। जैसे ही संजू के संघर्ष की दास्तां उन तक पहुँची, वे सिर्फ एक ‘अधिकारी’ नहीं रहे, बल्कि एक ‘अभिभावक’ की भूमिका में नजर आए।
उन्होंने इस मामले को सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं माना, बल्कि इसे सीधे मानवीय संवेदनाओं से जोड़ा। डीसी की आंखों में उन दोषियों के प्रति सख्ती थी जिन्होंने एक माँ की जिंदगी को मजाक बना दिया था। उन्होंने तुरंत जांच के आदेश देते हुए साफ कर दिया कि— “चतरा में अब किसी की लापरवाही किसी की जान पर भारी नहीं पड़ेगी।”
उपायुक्त का यह रुख उन सिसकियों के लिए मरहम जैसा है जो उस रात बाइक की सवारी करते हुए निकली थीं।** उनका यह आदेश केवल एक आधिकारिक आदेश नहीं है, बल्कि उस गरीब माँ के आंसुओं का सम्मान है।
संजू आज सुरक्षित है, लेकिन उस रात का खौफ शायद ही कभी मिट पाए। हालांकि, डीसी रवि आनंद की त्वरित कार्रवाई ने यह भरोसा जरूर दिलाया है कि भले ही सिस्टम के कुछ लोग बारात की खुशियों में अंधे हो गए हों, लेकिन प्रशासन की नजर उन पर है जो आज भी आम आदमी के हक को अपनी जागीर समझते हैं।
















