Mother's Day:-माँ है तो संभव है ,रांची के दीपाटोली की रहने वाली अंजू सिंह के 2 बेटे ऑटिज्म से पीड़ित, दोनों को खुद ट्रेनिंग दी

Mother’s Day:-माँ है तो संभव है ,रांची के दीपाटोली की रहने वाली अंजू सिंह के 2 बेटे ऑटिज्म से पीड़ित, दोनों को खुद ट्रेनिंग दी

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Mother’s Day

प्रेरणा चौरसिया

Drishti  Now  Ranchi

बेटी शिखा के दो साल बाद बेटा तुषार हुआ तो लगा मेरी फैमिली पूरी हो गई। जब तुषार 3 साल का हुआ तो अचानक उसने बोलना बंद कर दिया। मशहूर न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. केके सिन्हा को दिखाया तो उन्होंने कहा कि यह ऑटिज्म से पीड़ित है। उसे बेंगलुरू के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंस लेकर गई। वहां पता चला कि दवा नहीं ट्रेनिंग की जरूरत है।

5 साल बाद मुझे जुड़वां बच्चे हुए सौरभ और सचिन। सचिन भी ऑटिज्म से पीड़ित है। लोग सहानुभूति दिखाते, लेकिन मैं कभी निराश नहीं हुई। मुझे लगा कि मेरे बच्चे नहीं मैं ‘स्पेशल’ हूं तभी ईश्वर ने मुझे इनकी मां बनाया, मुझे इन्हें संवारने का मौका दिया। मेरे पति नयनगोपाल सिंह बैंक में थे, वे भी मुझे पूरा सपोर्ट करते।

रांची में स्पेशल चाइल्ड के लिए दीपशिखा स्कूल का पता चला, वहां दोनों को लेकर गई और उनकी ट्रेनिंग करवाने लगी। बेटों साथ मैं भी वहीं बैठी रहती और इनकी ट्रेनिंग देखती। कभी कोई टीचर नहीं आती तो मैं ही सभी बच्चों को ट्रेनिंग देने लगती। मेरी कोशिश देख दीपशिखा ने मुझे सहायक शिक्षक के रूप में रख लिया। अपने बच्चों के साथ अन्य बच्चों को सिखाकर मुझे असीम शांति मिलती है।

अब तक 60 से अधिक बच्चों को ट्रेनिंग दे चुकी हूं। लॉकडाउन में स्कूल बंद हो गए तो स्पेशल बच्चों को ऑनलाइन ट्रेनिंग देने लगी। ऑनलाइन में बच्चे अटक रहे थे। इनाबेल इंडिया ने प्रोजेक्ट डिस्कवरी में ब्रेक फ्री सॉल्यूशन शुरू किया। इसमें शिक्षकों को इन बच्चों की ट्रेनिंग के लिए इनोवेशन करना था। मैं घर में दोनों बच्चों को लेकर प्रयोग करने लगी। खाना बनाने वाली छननी से स्प्रे पेंटिंग करना सिखाया। मैंने वीडियो बनाकर भेजा और मुझे इनोवेशन के लिए देशभर में थर्ड प्राइज मिला।

कभी उम्मीद न छोड़ें, हमेशा सोचें कि बच्चा कल नहीं कर पाया, आज जरूर करेगा…

जिन मांओं को स्पेशल चाइल्ड हैं, वे कभी घबराएं नहीं, खुद को स्पेशल समझें, क्योंकि ईश्वर ने उन्हें इन बच्चों की मां बनाकर भेजा है। मांओं को धैर्य रखना होगा। बच्चों को मौका दीजिए, बार-बार मौका दीजिए। ये धीरे सीखते हैं, इसलिए आपको भी धीरे-धीरे सिखाना होगा।

ब्रश करना, नहाना, खाना सब गाइड करना होता है। मेरे बच्चे सालों तक चम्मच पकड़ नहीं पाते थे, अब अपना लगभग पूरा काम खुद करते हैं। इन्हें कभी छुपाए नहीं। हर जगह लेकर जाएं, सामान्य बच्चों से घुलने-मिलने दें। इन्हें समय दें और उम्मीद कभी न छोड़ें। हमेशा सोचें कि कल नहीं कर पाया था, आज जरूर कर लेगा।

 

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