कोलेबिरा के टूटीकेल में आदिवासी संस्कृति एवं भाषा संरक्षण पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित

शंभू कुमार सिंह
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!सिमडेगा : कोलेबिरा प्रखंड के टूटीकेल स्थित आदिवासी कला केंद्र सभागार में शनिवार को आदिवासी संस्कृति, परंपरा और भाषा के संरक्षण को लेकर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम HOPE एवं FIMI के संयुक्त सहयोग से संपन्न हुआ।
कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य आदिवासी समाज की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर, भाषा, कला एवं पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करते हुए उसे नई पीढ़ी तक प्रभावी रूप से पहुंचाना था। कार्यक्रम में वक्ताओं ने ‘जल, जंगल और जमीन’ के महत्व पर प्रकाश डालते हुए आदिवासी जीवनशैली की पहचान और सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।
इस दौरान प्रतिभागियों को आदिवासी संस्कृति संरक्षण, स्थानीय भाषाओं, लोकगीतों, पारंपरिक नृत्यों और पारंपरिक खेलों के महत्व की विस्तृत जानकारी दी गई। कार्यक्रम में उज्ज्वल कुशवाहा ने “आदिवासी भाषा और मौखिक साहित्य का महत्व” विषय पर अपने विचार रखते हुए युवाओं और बुजुर्गों के बीच संवाद को मजबूत करने तथा आदिवासी अधिकारों एवं सामाजिक विकास के मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने की बात कही।
वहीं मनोरमा एक्का ने कहा कि संस्कृति ही पहचान है और इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित करना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने प्रतिभागियों से अपनी भाषा, परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों को संजोकर रखने का आह्वान किया।
कार्यशाला में कोलेबिरा प्रखंड के लचरागढ़, ऐडेगा, टूटीकेल और डोमटोली पंचायतों से चयनित 50 प्रतिभागियों ने भाग लिया। कार्यक्रम को सफल बनाने में अरविंद वर्मा, दिनेश केरकेट्टा, वरलेश सुरीन, फुलमनी बागे और प्रिसकिला सुरीन सहित कई लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने कहा कि इस तरह की कार्यशालाएं आदिवासी संस्कृति और भाषा के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं और आगे भी ऐसे आयोजन जारी रहेंगे।
















