पीएम मोदी की साइप्रस यात्रा: तुर्की-पाकिस्तान गठजोड़ को भारत की कूटनीतिक चेतावनी

पीएम मोदी की साइप्रस यात्रा: तुर्की-पाकिस्तान गठजोड़ को भारत की कूटनीतिक चेतावनी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साइप्रस यात्रा, जो 23 वर्षों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली साइप्रस यात्रा है, ने वैश्विक कूटनीति में भारत की रणनीतिक चाल को एक बार फिर रेखांकित किया है। यह दौरा न केवल भारत-साइप्रस संबंधों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का प्रयास है, बल्कि तुर्की और पाकिस्तान के गठजोड़ को एक स्पष्ट और कड़ा संदेश भी देता है। साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडौलिडेस द्वारा गर्मजोशी से स्वागत किए गए पीएम मोदी को साइप्रस के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘ग्रैंड क्रॉस ऑफ द ऑर्डर ऑफ मकारियोस III’ से नवाजा गया, जो दोनों देशों के बीच गहरे ऐतिहासिक और रणनीतिक रिश्तों का प्रतीक है।

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साइप्रस का रणनीतिक महत्व

साइप्रस, पूर्वी भूमध्य सागर में स्थित एक छोटा सा द्वीपीय देश, भौगोलिक और कूटनीतिक दृष्टिकोण से भारत के लिए अहम है। यह यूरोप, एशिया और अफ्रीका को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण केंद्र है और 2026 में यूरोपीय संघ (EU) परिषद की अध्यक्षता करने वाला है। भारत-साइप्रस संबंधों का आधार ऐतिहासिक रहा है, जिसमें साइप्रस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत की स्थायी सदस्यता, पुलवामा और पहलगाम आतंकी हमलों की निंदा, और भारत-अमेरिका परमाणु समझौते जैसे मुद्दों पर भारत का समर्थन किया है। साइप्रस की यह स्थिति भारत को मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) में भी मजबूती प्रदान करती है, जो चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) को टक्कर देने की एक महत्वपूर्ण परियोजना है।

तुर्की-पाकिस्तान को कड़ा संदेश

यह यात्रा ऐसे समय में हुई है, जब तुर्की ने हाल ही में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान का खुलकर समर्थन किया था। तुर्की ने न केवल पाकिस्तान को ड्रोन और सैन्य तकनीक प्रदान की, बल्कि कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी भारत-विरोधी बयानबाजी की है। साइप्रस और तुर्की के बीच 1974 के तुर्की आक्रमण के बाद से तनावपूर्ण संबंध हैं, जब तुर्की ने साइप्रस के उत्तरी हिस्से पर कब्जा कर ‘तुर्की गणराज्य उत्तरी साइप्रस’ (TRNC) की स्थापना की थी, जिसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में केवल तुर्की ही मान्यता देता है। पीएम मोदी का साइप्रस दौरा, खासकर निकोसिया में तुर्की-नियंत्रित क्षेत्र के पास उनकी मौजूदगी, तुर्की के लिए एक सशक्त कूटनीतिक चुनौती के रूप में देखी जा रही है।

कूटनीतिक और आर्थिक लाभ

इस यात्रा से भारत का उद्देश्य साइप्रस के साथ व्यापार, प्रौद्योगिकी, और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देना है। साइप्रस की रणनीतिक स्थिति भारत को ऊर्जा संसाधनों, विशेष रूप से प्राकृतिक गैस, तक पहुंच प्रदान कर सकती है, जो भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, साइप्रस के माध्यम से भारत यूरोपीय संघ के साथ अपने व्यापार और सुरक्षा संबंधों को और मजबूत करना चाहता है। साइप्रस ने आतंकवाद के खिलाफ भारत का समर्थन करते हुए EU मंच पर पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद का मुद्दा उठाने का वादा किया है, जो भारत की कूटनीतिक जीत को दर्शाता है।

वैश्विक मंच पर भारत की रणनीति

पीएम मोदी की यह यात्रा तीन देशों (साइप्रस, कनाडा, और क्रोएशिया) के दौरे का हिस्सा है, जिसमें कनाडा में जी-7 शिखर सम्मेलन और क्रोएशिया की पहली ऐतिहासिक यात्रा शामिल है। यह दौरा भारत की ‘पड़ोसी पहले’, ‘एक्ट ईस्ट’, और ‘थिंक वेस्ट’ नीतियों का हिस्सा है, जो भारत की वैश्विक और क्षेत्रीय प्रभाव को बढ़ाने पर केंद्रित हैं। साइप्रस के साथ भारत की नजदीकी तुर्की के क्षेत्रीय प्रभाव को संतुलित करने और पाकिस्तान को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने की रणनीति का हिस्सा है।

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