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भोजशाला में कौतूहल का केंद्र बनी अनोखी ‘टिटहरी’: सालो बाद दिखी यह पक्षी मानो कोर्ट के फैसले का का इंतजार कर रही हो

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डेस्क : मध्य प्रदेश का ऐतिहासिक भोजशाला परिसर इन दिनों अपने कानूनी फैसले और भारी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर देश भर की सुर्खियों में है। लेकिन इस भारी राजनीतिक और सामाजिक हलचल के बीच, परिसर के भीतर से प्रकृति का एक ऐसा मनमोहक और दुर्लभ नज़ारा सामने आया है जिसने वैज्ञानिकों, पक्षी प्रेमियों और वहाँ आने वाले दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।

यहाँ एक ‘रेड-वॉटल्ड लैपविंग’ (लाल-कंठ वाली टिटहरी) को बेहद शांति और मुस्तैदी के साथ अपने अंडे सेने (Incubation) की प्रक्रिया में व्यस्त देखा गया है।

तपती ज़मीन और इंसानी शोर के बीच अटूट ममता

मध्य प्रदेश में इन दिनों भीषण गर्मी का दौर है, लेकिन इस तपती धूप में भी यह पक्षी अपने घोंसले से टस से मस नहीं हो रहा है। इस टिटहरी ने ऐतिहासिक परिसर के भीतर एक उथले पत्थर के कटोरे जैसी जगह के पास अपना ठिकाना बनाया है।

अपनी विशिष्ट पहचान—गर्दन पर खूबसूरत काला-सफेद पैटर्न, भूरे रंग के पंख और आगे से नुकीली लाल चोंच—के साथ यह पक्षी वहाँ आने वाले दर्शकों के लिए कौतूहल का विषय बन गया है। परिसर में चल रही अदालती सरगर्मी, सुरक्षा बलों की तैनाती और श्रद्धालुओं की आवाजाही के बावजूद, यह टिटहरी पूरी एकाग्रता से पथरीली ज़मीन पर आराम करते हुए अपने अंडों की रक्षा कर रही है।

अनोखा अंदाज़: मानो प्रशासन से पूछ रही हो सवाल

आम तौर पर टिटहरी स्वभाव से बहुत सतर्क और इंसानी दखल से दूर रहने वाला पक्षी माना जाता है। ज़रा सी आहट होने पर यह ज़ोर-ज़ोर से ‘डिड-यू-डू-इट’ (Did-you-do-it) जैसी आवाज़ निकालने लगती है।
भोजशाला परिसर में भी इस पक्षी का यही ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने का अंदाज़ देखने को मिला। परिसर में मौजूद कुछ लोगों ने इस पर चुटकी लेते हुए कहा कि टिटहरी का यह उग्र रूप और ज़ोर से चिल्लाना ऐसा प्रतीत होता है मानो वह सीधे प्रशासन से सवाल कर रही हो कि— *”इतने समय तक आप लोग हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठे थे? सालों से अटके इस मामले पर अब जाकर कार्रवाई क्यों की गई?”* सचमुच, इस संकट और हलचल के बीच पक्षी का यह अंदाज़ देखने लायक है।

क्या है इस पक्षी की खासियत?

रेड-वॉटल्ड लैपविंग (Red-wattled Lapwing): इसे भारत में आम बोलचाल की भाषा में ‘टिटहरी’ कहा जाता है।

घोंसला बनाने का तरीका: यह पक्षी पेड़ों पर घोंसला बनाने के बजाय खुले मैदानों, पथरीली ज़मीन या कंकड़ों के बीच छोटे गड्ढों में अपने अंडे देता है।
अंडों का छलावरण (Camouflage): इसके अंडों का रंग पत्थरों से इतना मिलता-जुलता होता है कि इन्हें आसानी से पहचान पाना मुश्किल होता है, जिससे ये शिकारियों से बचे रहते हैं।
भोजशाला परिसर की ऐतिहासिक दीवारों के बीच जीवन की इस नई शुरुआत और एक माँ (पक्षी) के इस कड़े संघर्ष ने विवादों के बीच भी लोगों के चेहरों पर मुस्कान बिखेर दी है।

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