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जंगल सिमटे, हाथी गलियारे टूटे तो गांवों में बढ़ा खतरा, पांच साल में 474 लोगों की मौत

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झारखंड में जंगलों के सिमटने और हाथियों के पारंपरिक गलियारों में मानवीय दखल बढ़ने के साथ मानव-हाथी संघर्ष गंभीर होता जा रहा है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच राज्य में हाथियों के हमले में 474 लोगों की मौत हुई। मानव मौतों के मामले में झारखंड देश में ओडिशा के बाद दूसरे स्थान पर रहा। पांच वर्षों में सबसे अधिक 133 मौतें 2021-22 में दर्ज की गईं। 2019-20 में 84, 2020-21 में 74, 2022-23 में 96 और 2023-24 में 87 लोगों की जान गई। यानी इस अवधि में हर साल औसतन करीब 95 लोग हाथियों के हमले का शिकार हुए।

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मानव-हाथी संघर्ष की वजह केवल हाथियों का गांवों में आना नहीं है। जंगलों का खंडित होना, खनन का विस्तार, सड़क-रेल परियोजनाएं, औद्योगिक और शहरी विस्तार तथा हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्गों में बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप इसके प्रमुख कारण हैं। हाथियों के पारंपरिक रास्तों को हाथी गलियारा कहा जाता है। इन रास्तों पर सड़क, रेलवे लाइन, बिजली की लाइन, खनन क्षेत्र या बस्तियां विकसित होने से हाथियों की आवाजाही बाधित होती है। ऐसे में झुंड वैकल्पिक रास्ता तलाशते हैं और कई बार यह रास्ता सीधे गांवों और खेतों से होकर गुजरता है।

जंगलों में प्राकृतिक चारा, पेड़-पौधों और जलस्रोतों की उपलब्धता घटने पर हाथी खेतों की ओर आकर्षित होते हैं। धान, सब्जियों और अन्य फसलों से उन्हें आसानी से भोजन मिल जाता है। हाथियों के खेतों में पहुंचने से फसल और घरों को नुकसान होता है, वहीं ग्रामीण उन्हें भगाने के दौरान जोखिम में पड़ जाते हैं। कई बार ग्रामीण हाथियों को खदेड़ने के लिए पटाखे छोड़ते हैं, शोर करते हैं या उनके करीब पहुंच जाते हैं। खतरा महसूस होने पर हाथी आक्रामक हो सकते हैं और यही स्थिति जानलेवा हमले में बदल जाती है।

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पश्चिमी सिंहभूम का सारंडा और आसपास का वन क्षेत्र, सरायकेला-खरसावां का चांडिल-नीमडीह इलाका तथा पूर्वी सिंहभूम के चाकुलिया, बहरागोड़ा और धालभूमगढ़ समेत कई क्षेत्र मानव-हाथी संघर्ष से प्रभावित रहे हैं। हजारीबाग, रामगढ़ और बोकारो में भी हाथियों की गतिविधियां ग्रामीणों के लिए चिंता का कारण बनी हुई हैं। हाल के महीनों में हजारीबाग में जंगली हाथियों के झुंड के हमले में एक ही परिवार के चार सदस्यों समेत सात लोगों की मौत की घटना ने इस संकट की गंभीरता को सामने ला दिया। इसके बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर मानव-हाथी संघर्ष पर ठोस कार्ययोजना बनाने का निर्देश दिया।

सरकार अब हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्गों की विस्तृत मैपिंग और संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान पर जोर दे रही है। उद्देश्य है कि हाथियों के नियमित रास्तों को चिह्नित कर वहां मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित किया जा सके। हाथी प्रभावित गांवों के लोगों को प्रशिक्षण देने और स्थानीय प्रशिक्षित लोगों को हाथी बचाव दल से जोड़ने की योजना पर भी काम किया जा रहा है। इससे हाथियों की गतिविधियों की सूचना समय पर मिलने और ग्रामीणों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने में मदद मिल सकती है।

मानव-हाथी संघर्ष कम करने के लिए रेडियो कॉलर, निगरानी कैमरे, थर्मल और इन्फ्रारेड उपकरण तथा चेतावनी प्रणाली जैसी तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ाने पर जोर है। संवेदनशील गांवों में सायरन और अन्य माध्यमों से हाथियों की मौजूदगी की सूचना समय रहते देने की व्यवस्था महत्वपूर्ण हो सकती है। हाथियों की लोकेशन पहले पता चलने पर ग्रामीणों को सुरक्षित किया जा सकता है और वन विभाग की टीम भी समय रहते मौके पर पहुंच सकती है।

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हाथियों को गांवों में प्रवेश करने से रोकने के लिए कई जगह खाइयां खोदने, जागरूकता अभियान चलाने और हाथी भगाने वाली टीमों को सक्रिय करने जैसे उपाय किए जा रहे हैं। हमले में मौत होने पर प्रभावित परिवारों को मुआवजा भी दिया जाता है। हालांकि केवल खाई, हाथी भगाने की व्यवस्था या मुआवजे से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। जब तक हाथियों के प्राकृतिक आवास और उनके पारंपरिक गलियारे सुरक्षित नहीं होंगे, तब तक संघर्ष का खतरा बना रहेगा।

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झारखंड में सड़क, रेल, खनन और औद्योगिक परियोजनाएं विकास के लिए जरूरी हैं, लेकिन इनके निर्माण की योजना बनाते समय वन्यजीवों के आवागमन को भी ध्यान में रखना होगा। जहां हाथी गलियारे सड़क या रेलवे लाइन को पार करते हैं, वहां सुरक्षित वन्यजीव मार्ग विकसित करने और अवरोध कम करने की जरूरत है। हाथी गलियारों का वैज्ञानिक मानचित्रण इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

हाथी प्रभावित गांवों में ऐसी फसलों और पौधों को बढ़ावा देने पर भी विचार किया जा सकता है, जिन्हें हाथी अपेक्षाकृत कम पसंद करते हैं। खेतों की सीमा पर मिर्च, नींबू जैसी फसलों और सामुदायिक जैविक अवरोधों का इस्तेमाल कुछ क्षेत्रों में किया जा सकता है। हालांकि ऐसे उपाय स्थानीय परिस्थितियों और किसानों की आय को ध्यान में रखकर ही लागू किए जाने चाहिए।

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हाथी के गांव में पहुंचने पर ग्रामीणों की प्रतिक्रिया भी बेहद महत्वपूर्ण है। हाथी को देखने या उसका वीडियो बनाने के लिए उसके करीब जाना, भीड़ जुटाना, पटाखे छोड़ना या उसे घेरकर भगाने की कोशिश जानलेवा साबित हो सकती है। हाथियों की सूचना मिलते ही वन विभाग को जानकारी देना, सुरक्षित दूरी बनाए रखना और बच्चों व बुजुर्गों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना जरूरी है। संवेदनशील गांवों में नियमित प्रशिक्षण और मॉक ड्रिल भी ग्रामीणों को आपात स्थिति से निपटने में मदद कर सकते हैं।

मानव-हाथी संघर्ष से निपटने के लिए झारखंड में प्रशिक्षित हाथियों की मदद लेने की योजना भी सामने आई है। वन अधिकारियों ने मुख्यमंत्री को बताया है कि जंगली हाथियों के बचाव और नियंत्रण अभियान में सहायता के लिए छह प्रशिक्षित हाथी झारखंड लाए जा रहे हैं। ऐसे प्रशिक्षित हाथियों को आम तौर पर ‘कुमकी’ हाथी कहा जाता है और विशेष परिस्थितियों में इनका इस्तेमाल जंगली हाथियों को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।

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पांच वर्षों में 474 लोगों की मौत का आंकड़ा बताता है कि मानव-हाथी संघर्ष अब केवल वन विभाग की समस्या नहीं रह गया है। यह ग्रामीण सुरक्षा, कृषि, पर्यावरण संरक्षण और सड़क-रेल व औद्योगिक विकास से जुड़ा व्यापक मुद्दा है।

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स्थायी समाधान के लिए हाथियों के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित करने, पारंपरिक गलियारों को बचाने, जंगलों में भोजन-पानी की उपलब्धता बढ़ाने, विकास परियोजनाओं में वन्यजीव मार्गों को शामिल करने और ग्रामीणों तक समय पर चेतावनी पहुंचाने की जरूरत है। चुनौती ग्रामीणों की जान-माल की सुरक्षा के साथ हाथियों के संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की है। 474 मौतों का आंकड़ा इसी संतुलन की तत्काल जरूरत की गंभीर चेतावनी है।

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अश्वनी पाठक

अश्वनी पाठक

रिपोर्टर

अश्वनी पाठक जमशेदपुर निवासी हैं और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने न्यूज मीडिया किरण के माध्यम से पत्रकारिता की शुरुआत की। वाणिज्य में ऑनर्स (बी.कॉम) की शिक्षा पूरी करने के बाद वर्तमान में एलएलबी की पढ़ाई कर रहे हैं। पत्रकारिता के साथ-साथ वे कानून की शिक्षा भी प्राप्त कर रहे हैं।