कौन करेगा कुडमियों का नेतृत्व…..रेल रोको आंदोलन के बाद नेतृत्व को लेकर मची होड़ । मुद्दे पर दृष्टि नाउ की विशेष रिपोर्ट…
कौन करेगा कुडमियों का नेतृत्व…..रेल रोको आंदोलन के बाद नेतृत्व को लेकर मची होड़ । मुद्दे पर दृष्टि नाउ की विशेष रिपोर्ट…
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!कुड़मी समाज एक बार फिर से आंदोलन की राह पर है। आज राज्य के कई स्टेशन पर उन्होंने न केवल धरना प्रदर्शन किया बल्कि आंदोलन ने रेल यातायात को भी प्रभावित किया।विभाग ने हालांकि अपनी ओर से यात्रियों की सुविधा का ख्याल अवश्य रखा बावजूद इसके कई ट्रेनों के रूट बदले गए तो कई ट्रेनों के परिचालन के समय में परिवर्तन किया गया। तो कई ट्रेनें रद्द करनी पड़ी।
“आंदोलन के पीछे कुडमियों की वही पुरानी मांग उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया जाय।”
ऐसा नहों है कि पहली बार कुड़मी रेल ट्रैक पर उतरे हैं।लेकिन यह आंदोलन अब राजनीति का रूप ले चुकी है। कुडमियों का नेता कौन होगा इसको लेकर होड़ मची हुई है। वहीं दूसरी ओर आदिवासी समाज इस मुद्दे को लेकर लगातार विरोध कर रहा है।कहा जाय कुड़मी और आदिवासी इस मुद्दे पर आमने सामने हैं तो शायद गलत नहीं होगा।
कुडमियों का नेता कौन होगा इसको लेकर राज्य की राजनीति में धूमकेतु की तरह आये जयराम महतो और देवेंद्र महतो ने अपनी जबरदस्त छाप छोड़ी है। स्थिति यह है कि जयराम न केवल पूरे समाज को जोड़ने के काम मे लगे दिखाई दे रहे हैं बल्कि उनके नेतृत्व में पुराने नेता उनके साथ चलने पर मजबूर भी दिखाई दे रहे हैं। समाज इनके साथ एकजुट होकर आगे बढ़ना चाहता है तो पुराने लोगों से दूरी भी बनाना चाहता है।
ऐसे में लंबे समय तक कुडमियों का नेतृत्व कर रहे सुदेश महतो आखिर क्यों पीछे रहते। ढलते सूर्य को एक बार फिर से चमक देने की कोशिश में लगे आजसू ने इस आंदोलन का समर्थन किया है। उसके नेता भी आंदोलन को लेकर जमीन पर उतरे। तो दूसरी ओर अजित प्रसाद महतो, हरमोहन महतो, शीतल ओहदार, अनूप महतो जैसे लोग अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश करते दिख रहे हैं।
सवाल यह है कि आखिर इस होड़ के पीछे की राजनीति क्या है? सीधी सी बात है कुडमियों की जनसंख्या। जिनके समर्थन से विधामसभा और लोकसभा तक का सफर काफी आसान हो जाता है। झारखंड के अलावे कुड़मी ओडिसा, बंगाल में भी अच्छी खासी संख्या में हैं ।झारखंड में उनकी आबादी लगभग 15-20 फीसदी तक है। जो यहां के लगभग 20 विधानसभा क्षेत्र और लोकसभा के आधे दर्जन सीटों को प्रभावित करते हैं ।और यह पूरी कवायद इसी को लेकर है।
कुल मिलाकर देखा जाय तो कुड़मी आंदोलन को एक और जहां समाज से जुड़े लोग अपने अस्तित्व की लड़ाई से जोड़कर देख रहे है तो दूसरी ओर समाज का नेता बनने की होड़ में जुटे लोग इसका राजनीतिकरण करने की मंशा रखते भी दिखाई दे रहे हैं। आंदोलन को लेकर कुड़मी और आदिवासियों के बीच टकराव की स्थिति एक गंभीर पहलू बना हुआ है। इन तमाम पहलुओं के बीच आंदोलन बेपटरी होकर राजनीति की भेंट चढ़ जाय इसकी आसंका भी बनी हुई है। ऐसे में आन्दोलन का मूल उद्देश्य कितना पूरा हो पाता है लोगों की निगाहें इस पर अवश्य टिकी होंगी।

















