सेना पर भरोसा और सिस्टम पर सवाल: नीट विवाद ने क्या उजागर किया?

देश की सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट यूजी में कथित पेपर लीक और गड़बड़ियों को लेकर उठे विवाद ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। लाखों छात्रों और अभिभावकों के बीच असमंजस और नाराज़गी का माहौल है। इस पूरे घटनाक्रम के बाद केंद्र सरकार अब डैमेज कंट्रोल मोड में दिखाई दे रही है। चर्चा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय खुद मामले की निगरानी कर रहा है और दोबारा होने वाली परीक्षा के दौरान प्रश्न पत्रों के सुरक्षित परिवहन और व्यवस्था के लिए भारतीय वायु सेना की मदद लेने पर विचार किया जा रहा है।
लेकिन इस चर्चा ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — क्या देश की प्रशासनिक व्यवस्था पर अब भरोसा कम हो गया है? आज स्थिति यह बन चुकी है कि चाहे चुनाव कराना हो, किसी प्राकृतिक आपदा से निपटना हो, आतंकवाद के खिलाफ अभियान चलाना हो या फिर किसी बड़ी परीक्षा को सुरक्षित तरीके से आयोजित करना हो, हर बार सेना और अर्धसैनिक बलों की ओर देखा जाता है। इससे यह संदेश भी जाता है कि सामान्य प्रशासनिक तंत्र की कार्यक्षमता और ईमानदारी पर सवाल उठ रहे हैं।
भारतीय सेना कोई दैवीय शक्ति नहीं है। सेना के जवान भी इसी समाज से आते हैं। उनमें और आम नागरिकों में फर्क सिर्फ इतना है कि सेना अनुशासन, जवाबदेही और देश के प्रति समर्पण को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है। यही कारण है कि जनता का भरोसा सेना पर सबसे अधिक बना रहता है।
नीट विवाद ने सिर्फ परीक्षा प्रणाली की कमजोरियों को उजागर नहीं किया, बल्कि देश के संस्थागत ढांचे पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। अगर एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा के प्रश्न पत्र को सुरक्षित रखने के लिए वायु सेना की जरूरत महसूस हो रही है, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था के लिए चिंतन का विषय है।
सरकार के लिए यह समय सिर्फ व्यवस्था संभालने का नहीं, बल्कि जनता का भरोसा दोबारा जीतने का भी है। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी संस्थाओं पर जनता का विश्वास होता है। अगर हर संकट में सेना ही अंतिम विकल्प बन जाए, तो यह संकेत है कि नागरिक प्रशासन को अपने भीतर झांकने और सुधार करने की आवश्यकता है।

















