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लोहरदगा में पेसा (PESA) कानून को लेकर आर-पार: पारंपरिक व्यवस्था के समर्थन में DC को सौंपा ज्ञापन

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लोहरदगा में पेसा कानून और पारंपरिक ग्राम सभाओं के अस्तित्व को लेकर विवाद। निशा उरांव के नेतृत्व में डीसी को सौंपा गया ज्ञापन। जानिए पूरी खबर।

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प्रीतम / लोहरदगा

लोहरदगा : लोहरदगा जिले में पेसा (PESA) कानून के क्रियान्वयन और आदिवासी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को लेकर विवाद गहरा गया है। आदिवासी समाज की पारंपरिक बहुस्तरीय व्यवस्था के प्रतिनिधियों ने वरिष्ठ आईआरएस अधिकारी निशा उरांव के नेतृत्व में उपायुक्त (DC) को ज्ञापन सौंपकर अपनी कड़ी नाराजगी दर्ज कराई है।

‘मॉडल ग्राम सभा’ पर उठे सवाल

ज्ञापन के माध्यम से प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया है कि जिले में ‘मॉडल ग्राम सभा’ के नाम पर ऐसी समानांतर व्यवस्थाएं बनाई जा रही हैं, जो आदिवासी रूढ़िजन्य कानूनों (Tribal Customary Laws) और पारंपरिक ग्राम सभाओं के मूल स्वरूप के विपरीत हैं। प्रतिनिधियों ने चेताया कि इस तरह के प्रयास आदिवासी समाज की सदियों पुरानी लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर कर रहे हैं।

पारंपरिक पदों की सर्वोच्चता की मांग

आदिवासी समाज ने प्रशासन से स्पष्ट मांग की है कि ग्राम स्तर पर: ग्राम प्रधान, महतो, पाहन और पड़हा राजा जैसे पारंपरिक पदों को ही कानूनी और प्रशासनिक मान्यता दी जाए।

नई ग्राम सभाओं के गठन और पेसा नियमावली से जुड़ी समितियों में इन पारंपरिक प्रतिनिधियों की अनिवार्य भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

धर्मांतरण और भूमि अधिकार पर जताई चिंता

ज्ञापन में कुछ गंभीर मुद्दों पर भी प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया गया है:
1. पारंपरिक पदों पर धर्मांतरित व्यक्ति: समाज ने पारंपरिक पदों पर धर्मांतरित व्यक्तियों की नियुक्ति पर आपत्ति जताई है।
2. चंगाई सभाएं: गांवों में आयोजित हो रही चंगाई सभाओं पर सवाल उठाए गए हैं।
3. भुईहरी-पहनाई भूमि: आदिवासी समुदाय की सुरक्षित भुईहरी-पहनाई भूमि के उपयोग और उससे जुड़े विवादों की जांच की मांग की गई है।

निशा उरांव के नेतृत्व में पहुंचे प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि पेसा कानून का असली उद्देश्य आदिवासी स्वशासन को सशक्त बनाना था, न कि उसे दरकिनार करना। समाज ने चेतावनी दी है कि यदि पारंपरिक व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ जारी रही, तो वे चरणबद्ध आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।

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