Saryu Roy

झारखंड: जब भ्रष्टाचार उजागर करना बन जाए अपराध? सरयू राय का छलका दर्द ..प्रशासनिक तंत्र का अजीब कहानी


नवीन कुमार

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रांची:  झारखंड में दवा खरीद का मामला सिर्फ करोड़ों के वारे-न्यारे का नहीं है, बल्कि यह उस ‘सिस्टम’ की क्रूरता का भी है, जहां घोटालेबाज महफूज हैं और उन्हें बेनकाब करने वाले अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग में दवा खरीद के नाम पर हुए कथित खेल ने सरयू राय का वह दर्द फिर ताजा कर दिया है, जो हर उस व्यक्ति का है जो व्यवस्था सुधारने की कोशिश करता है।

भ्रष्टाचार करने वाले ‘बाहर’, उजागर करने वाले ‘कटघरे’ में

विधायक सरयू राय का सोशल मीडिया पर किया गया पोस्ट केवल एक आरोप नहीं है, बल्कि राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था पर एक तंज है। उन्होंने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जब वे दस्तावेज सार्वजनिक करते हैं, तो सरकार का पूरा तंत्र उन्हें गलत साबित करने के बजाय उन पर ही ‘गोपनीय दस्तावेज चुराने’ का मुकदमा ठोक देता है।

यह अजीब विरोधाभास है—दवाओं की खरीद में टेंडर की दरों को दरकिनार कर GeM पोर्टल से कई गुना महंगी खरीदारी हो रही है। इस पर विभाग का तर्क है कि ‘आपातकाल’ था। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आपातकाल के नाम पर खजाना लुटाने वाले अधिकारी कहाँ हैं? उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती, जबकि सच बोलने वालों पर कानूनी शिकंजा कसा जाता है।

सरयू राय का संकल्प: “मुकदमा लड़कर खुश हूँ”

सरयू राय का यह जुमला—“अगर सरकार मुकदमा करके खुश है, तो मैं मुकदमा लड़कर खुश हूँ”—यह दिखाता है कि एक जन-प्रतिनिधि के लिए सच बोलना कितना महंगा पड़ता है। यह उन तमाम लोगों के लिए एक सीख है जो सरकारी फाइलों के भीतर छिपे भ्रष्टाचार को बाहर लाने की हिम्मत करते हैं।

दृष्टि नाउ की नज़र में

सवाल सिर्फ ओफ्लॉक्सासिन टैबलेट या मल्टीविटामिन कैप्सूल की कीमतों का नहीं है। सवाल यह है कि क्या सरकारी तंत्र में पारदर्शिता के लिए जगह बची है?

यदि खरीद में गड़बड़ी हुई है, तो दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं?

क्या ‘गोपनीयता’ का इस्तेमाल भ्रष्टाचार को छिपाने के एक ढाल (Shield) के रूप में किया जा रहा है?

एक जन-प्रतिनिधि को बार-बार अदालतों का चक्कर लगवाकर क्या जनता की आवाज को दबाने की कोशिश हो रही है?

आज राज्य की जनता को यह समझने की जरूरत है कि फाइलों में छिपे भ्रष्टाचार को उजागर करना कितना चुनौतीपूर्ण है। सरयू राय का यह दर्द यह बताने के लिए काफी है कि झारखंड में ‘ईमानदारी’ की कीमत कितनी महंगी होती जा रही है।

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