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मधुकम जमीन विवाद: हाईकोर्ट ने पलटा पुराना आदेश, 12 परिवारों को राहत; याचिकाकर्ता पर 12 लाख का जुर्माना

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रांची: रातू रोड के मधुकम जमीन विवाद मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए अपने ही पूर्व आदेश को निरस्त कर दिया है। जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता महादेव उरांव ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर 22 अक्टूबर 2024 का आदेश हासिल किया था। इसी आधार पर अदालत ने उस आदेश को शून्य और कानूनी रूप से प्रभावहीन घोषित कर दिया। इसके साथ ही महादेव उरांव पर 12 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है, जिसे चार सप्ताह के भीतर मामले से जुड़े 12 प्रभावित परिवारों को एक-एक लाख रुपये के हिसाब से देना होगा।

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इस फैसले से फिलहाल मधुकम क्षेत्र के 12 परिवारों को बड़ी राहत मिली है। अदालत ने महादेव उरांव द्वारा दायर अवमानना याचिका भी खारिज कर दी।

सीओ की कार्रवाई पर अदालत की सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान अदालत ने हेहल के तत्कालीन अंचलाधिकारी (सीओ) की कार्यप्रणाली पर भी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि सीओ को केवल नोटिस जारी कर कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने उससे आगे बढ़कर मकानों को ध्वस्त करने की कार्रवाई शुरू कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने कभी भी मकान तोड़ने का आदेश नहीं दिया था और भविष्य में न्यायालय के आदेशों का पालन करते समय अधिकारियों को अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है।

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तथ्य छिपाने पर जताई नाराजगी

हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत से किसी भी महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाना गंभीर अपराध है। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि न्यायालय के समक्ष पूर्ण और सही तथ्य रखना प्रत्येक पक्ष की जिम्मेदारी है।

11 समझौते और 1.08 करोड़ रुपये का नहीं किया था खुलासा

अदालत ने पाया कि महादेव उरांव ने अपनी 2024 की रिट याचिका में यह जानकारी नहीं दी थी कि वर्ष 2019 से 2020 के बीच उन्होंने विवादित जमीन को लेकर 11 सेटलमेंट एग्रीमेंट किए थे। इन समझौतों के तहत जमीन पर रह रहे 12 लोगों से करीब 1.08 करोड़ रुपये भी प्राप्त किए गए थे। कोर्ट के अनुसार यह तथ्य सीधे मामले से जुड़ा था और इसे जानबूझकर छिपाया गया।

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इसके अलावा, जिन 12 परिवारों के अधिकार इस मामले से प्रभावित थे, उन्हें भी रिट याचिका में पक्षकार नहीं बनाया गया था। अदालत ने कहा कि यदि इन परिवारों को प्रतिवादी बनाया जाता और समझौतों की जानकारी पहले ही सामने आती, तो 22 अक्टूबर 2024 का आदेश अलग हो सकता था।

सभी पक्षों को कानूनी कार्रवाई की स्वतंत्रता

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवादित जमीन के स्वामित्व, कब्जे और अधिकार से जुड़े सभी पक्ष कानून के अनुसार सक्षम न्यायालय में अपनी-अपनी दावेदारी और अधिकारों के लिए स्वतंत्र रूप से कार्रवाई कर सकते हैं।

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