The Delimitation Crisis in Jharkhand: Unity or a New Divide Among the Tribal Community?

झारखंड में परिसीमन का संकट: आदिवासी समाज में एकता या नया विभाजन?

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The Delimitation Crisis in Jharkhand: Unity or a New Divide Among the Tribal Community?
The Delimitation Crisis in Jharkhand: Unity or a New Divide Among the Tribal Community?

नवीन कुमार 

रांची: झारखंड में संभावित परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज के भीतर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। 30 अगस्त को रांची के मोरहाबादी मैदान में प्रस्तावित ‘आदिवासी एकता महाजुटान रैली’ को लेकर जहां कई आदिवासी संगठन तैयारियों में जुटे हैं, वहीं कुछ सरना संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। ऐसे में परिसीमन का मुद्दा अब महज सीटों के पुनर्निर्धारण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि आदिवासी पहचान, धर्म, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक एकता से जुड़ता जा रहा है।

एसटी सीटों में कमी की आशंका ने बढ़ाई चिंता

झारखंड विधानसभा की 81 सीटों में वर्तमान में 28 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं, जबकि लोकसभा की 14 सीटों में 5 एसटी आरक्षित हैं। आदिवासी संगठनों के बीच आशंका है कि नई जनगणना के आंकड़ों के आधार पर होने वाले संभावित परिसीमन में एसटी आरक्षित सीटों की संख्या प्रभावित हो सकती है।

हालांकि, सीटों की वास्तविक संख्या में किसी संभावित बदलाव को लेकर अभी अंतिम परिसीमन निर्णय सामने नहीं आया है। इसी आशंका को लेकर आदिवासी संगठन मौजूदा आरक्षित सीटों को सुरक्षित रखने और आबादी बढ़ने के साथ सीटों में भी वृद्धि की मांग कर रहे हैं। इस बहस की पृष्ठभूमि में 2002-08 की परिसीमन प्रक्रिया का भी उल्लेख किया जा रहा है, जब झारखंड में एसटी आरक्षित सीटों की संख्या घटाने का प्रस्ताव सामने आया था। व्यापक विरोध के बाद वर्ष 2009 में संसद ने झारखंड के लिए उस बदलाव को प्रभावहीन कर दिया था।

क्या है आदिवासी संगठनों की मांग?

परिसीमन को लेकर आंदोलन कर रहे संगठनों की प्रमुख मांगों में मौजूदा एसटी आरक्षित सीटों में कटौती नहीं करना, कुल विधानसभा सीटें बढ़ने की स्थिति में आदिवासी आरक्षित सीटों को भी अनुपातिक रूप से बढ़ाना और अनुसूचित क्षेत्रों की ऐतिहासिक एवं संवैधानिक स्थिति को ध्यान में रखना शामिल है। पूर्व मंत्री और आदिवासी नेता बंधु तिर्की समेत कई नेता इसे आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अस्तित्व से जोड़कर देख रहे हैं। उनका तर्क है कि एसटी सीटों में कमी का असर भविष्य में आदिवासी नेतृत्व और राज्य की सत्ता-समीकरण पर पड़ सकता है।

30 अगस्त की रैली को लेकर आमने-सामने संगठन

मोरहाबादी मैदान में होने वाली रैली को कई आदिवासी संगठनों और सामाजिक समूहों का समर्थन मिलने का दावा किया जा रहा है। समर्थक इसे संवैधानिक अधिकारों और आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व की रक्षा के लिए एकजुटता का मंच बता रहे हैं। दूसरी ओर, केंद्रीय सरना समिति समेत कुछ सरना संगठन रैली का विरोध कर रहे हैं। विरोध करने वाले संगठनों का आरोप है कि आदिवासी एकता के नाम पर धर्मांतरित ईसाई आदिवासियों को संगठित करने की कोशिश की जा रही है और इसमें चर्च की भूमिका है। वे इस विवाद को डीलिस्टिंग, सरना धर्म कोड और आदिवासी धार्मिक पहचान जैसे मुद्दों से भी जोड़ रहे हैं।

हालांकि, इन आरोपों और रैली के आयोजकों के पक्ष को अलग-अलग रूप में देखना जरूरी है। विवाद का केंद्र अब यही सवाल बनता जा रहा है कि आदिवासी पहचान की परिभाषा धार्मिक आधार पर होगी या जनजातीय और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर।

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सरना कोड और डीलिस्टिंग से जुड़ा पुराना विवाद

झारखंड में सरना धर्म कोड और धर्मांतरित आदिवासियों को एसटी सूची में रखने के सवाल पर पहले से ही मतभेद रहे हैं। एक पक्ष अलग सरना धर्म कोड की मांग को आदिवासी धार्मिक पहचान की सुरक्षा से जोड़ता है, जबकि दूसरा पक्ष धर्म परिवर्तन के बावजूद आदिवासी समुदाय और संवैधानिक अधिकारों को अलग-अलग मानने के पक्ष में है। अब परिसीमन की बहस में इन मुद्दों के जुड़ने से आदिवासी समाज के भीतर मौजूद मतभेद राजनीतिक रूप से और अधिक मुखर होते दिखाई दे रहे हैं।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल

झारखंड की राजनीति में एसटी आरक्षित सीटों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐसे में परिसीमन के दौरान इन सीटों की संख्या या भौगोलिक सीमा में बदलाव का असर राज्य की राजनीति और सत्ता-समीकरण पर पड़ सकता है। आदिवासी संगठनों का एक बड़ा वर्ग चाहता है कि परिसीमन में केवल जनसंख्या के आंकड़ों को आधार न बनाया जाए, बल्कि पांचवीं अनुसूची, अनुसूचित क्षेत्रों की विशिष्ट परिस्थितियों और आदिवासी समुदाय के ऐतिहासिक अधिकारों को भी ध्यान में रखा जाए।

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असली चुनौती आदिवासी एकता की

परिसीमन को लेकर शुरू हुई बहस ने आदिवासी समाज के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई सभी आदिवासी समुदायों को एक मंच पर ला पाएगी, या धर्म और पहचान का विवाद इस एकता को कमजोर करेगा? 30 अगस्त की रैली और उसके विरोध के बीच बढ़ती दूरी इस बात का संकेत है कि झारखंड में परिसीमन अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का विषय नहीं रह गया है। यह आदिवासी प्रतिनिधित्व, पहचान, धर्म और राजनीतिक भविष्य से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा बन चुका है।

आने वाले दिनों में सरकार, राजनीतिक दलों और आदिवासी संगठनों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि परिसीमन की बहस को संवैधानिक और तथ्यात्मक आधार पर आगे बढ़ाया जाए तथा सामाजिक विभाजन को और गहरा होने से रोका जाए।

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