उज्जैन के खड़े हनुमान की पूरी कहानी, पहले शॉर्ट सर्किट, फिर बारिश, फिर क्रेन फेल और वानरों का झुंड लेकिन टस से मस नहीं हुए प्रभु हनुमान
मंदिर का ढांचा टूट गया, लेकिन प्रतिमा अपनी जगह से नहीं हिली; चार दिनों में चार बार कोशिश, अब आस्था और तकनीक आमने-सामने

उज्जैन। मध्य प्रदेश के उज्जैन में सड़क चौड़ीकरण के बीच खड़े हनुमान जी की प्रतिमा को दूसरी जगह स्थानांतरित करने की कोशिश इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है। करीब 170 साल पुराने बताए जा रहे मंदिर के भवन को तो प्रशासन ने हटा दिया, लेकिन मंदिर में विराजमान हनुमान जी की प्रतिमा को हटाने की कोशिश लगातार नाकाम होती रही।
मामला सिर्फ इतना नहीं है कि क्रेन प्रतिमा को नहीं हिला सकी। प्रतिमा को हटाने की कोशिश शुरू होने के बाद पहले दिन शॉर्ट सर्किट, दूसरे दिन बारिश, फिर भारी मशीनों के फेल होने और इसके बाद बड़ी संख्या में वानरों के पहुंचने की घटनाओं ने पूरे मामले को आस्था से जोड़ दिया।
श्रद्धालु इसे भगवान हनुमान की इच्छा और चमत्कार मान रहे हैं, जबकि प्रशासन और विशेषज्ञ इसे तकनीकी एवं संरचनात्मक चुनौती के तौर पर देख रहे हैं।
क्यों हटाया जा रहा था मंदिर?
यह पूरा मामला उज्जैन के कंठाल चौराहे से छत्री चौक यानी बड़ा सराफा मार्ग का है।सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के तहत शहर में सड़क चौड़ीकरण और यातायात व्यवस्था सुधारने का काम चल रहा है। इसी सड़क की जद में सती गेट के पास स्थित खड़े हनुमान मंदिर आया।
यह मंदिर करीब 170 साल पुराना बताया जा रहा है। सड़क चौड़ीकरण के लिए प्रशासन ने मंदिर के भवन और चाहरदीवारी को हटाने की कार्रवाई की। भवन हट गया, लेकिन प्रतिमा को सुरक्षित तरीके से दूसरी जगह ले जाना चुनौती बन गया।प्रशासन की योजना प्रतिमा को दूसरी जगह स्थापित करने की थी।

पहला दिन: मंदिर हटाने की कार्रवाई और अचानक शॉर्ट सर्किट
प्रतिमा को स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरू हुई तो प्रशासन और नगर निगम की टीम मौके पर पहुंची। प्रतिमा को हटाने की तैयारी के बीच ही, स्थानीय लोगों और कुछ रिपोर्टों के मुताबिक, अचानक बिजली का शॉर्ट सर्किट हो गया। इससे मौके पर काम रोकना पड़ा और स्थिति सामान्य होने तक टीम को इंतजार करना पड़ा।
घटना को लेकर स्थानीय लोगों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। कुछ लोगों ने इसे सामान्य तकनीकी घटना माना, जबकि श्रद्धालुओं के एक वर्ग ने इसे भगवान हनुमान से जोड़कर देखना शुरू कर दिया।
दूसरा दिन: मशीनें तैयार थीं, लेकिन बारिश ने रोक दिया रास्ता
अगले दिन प्रशासन की टीम दोबारा प्रतिमा को स्थानांतरित करने की तैयारी में जुटी। लेकिन स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार तेज बारिश शुरू हो गई।बारिश के कारण मौके पर मशीनरी के साथ काम करना मुश्किल हो गया और प्रतिमा को हटाने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। इस बीच लोगों के बीच चर्चा और तेज हो गई। अब तक दो घटनाएं हो चुकी थीं—पहले शॉर्ट सर्किट और फिर बारिश। लेकिन असली चुनौती इसके बाद सामने आने वाली थी।
तीसरा दिन: फूलों से सजी क्रेन पहुंची, लेकिन हनुमान जी नहीं हिले
तीसरे दिन प्रशासन ने पूरी तैयारी के साथ प्रतिमा को हटाने का प्रयास किया। भारी मशीनें और क्रेन मौके पर पहुंचाई गईं। रिपोर्टों के अनुसार क्रेन को फूलों से सजाया गया था और विधि-विधान के साथ प्रतिमा को स्थानांतरित करने की कोशिश की गई। लेकिन जब क्रेन से जोर लगाया गया तो प्रतिमा अपनी जगह से नहीं हिली।
मशीनों की ताकत काम नहीं आई।
एक बार नहीं, बल्कि लगातार प्रयास किए गए। लेकिन प्रतिमा के नहीं हिलने से प्रशासन और इंजीनियरों के सामने तकनीकी चुनौती खड़ी हो गई। इंदौर से इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों की टीम भी बुलाई गई। विशेषज्ञों ने प्रतिमा के आधार और आसपास की संरचना को समझकर उसे बिना नुकसान पहुंचाए हटाने की कोशिश की।
चौथा दिन: मशीनें फिर लगीं, लेकिन प्रतिमा टस से मस नहीं हुई
चौथे दिन एक बार फिर प्रतिमा को हटाने की कोशिश हुई।भारी मशीनों के बावजूद स्थिति पहले जैसी ही रही।हनुमान जी की प्रतिमा अपनी जगह पर खड़ी रही। यहीं से मामला प्रशासनिक कार्रवाई से आगे बढ़कर धार्मिक आस्था का मुद्दा बन गया। श्रद्धालुओं का कहना था कि जब लगातार प्रयासों के बाद भी प्रतिमा नहीं हट रही है तो प्रशासन को अपना फैसला बदलना चाहिए। हिंदू संगठनों और स्थानीय श्रद्धालुओं ने प्रतिमा को हटाने का विरोध शुरू कर दिया और मंगलवार शाम बड़ी संख्या में लोगों ने वहां महाआरती की।
और तभी पहुंच गई ‘वानर सेना’
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा वानरों के झुंड को लेकर हुई। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, प्रतिमा को हटाने की कोशिशों के दौरान अचानक बड़ी संख्या में वानर वहां पहुंच गए। कुछ रिपोर्टों में इनकी संख्या 50 से 60 के आसपास बताई गई है। वानरों को देखकर श्रद्धालुओं ने इसे भगवान हनुमान से जोड़ना शुरू कर दिया। लोगों ने हनुमान चालीसा का पाठ किया और जय श्रीराम के जयकारे लगाए।
प्रशासन ने अब मशीनों की जगह विशेषज्ञों पर भरोसा किया
लगातार असफल प्रयासों के बाद प्रशासन ने जल्दबाजी में प्रतिमा को खींचने या उठाने से परहेज किया। प्रतिमा के आधार को समझने के लिए करीब डेढ़ फीट तक गड्ढा खोदा गया।इसका उद्देश्य यह पता लगाना था कि प्रतिमा किस तरह जमीन में स्थापित है और उसके नीचे की संरचना कैसी है।
विशेषज्ञों से आसपास की जमीन और प्रतिमा के आधार की जांच कराई जा रही है।प्रशासन का जोर इस बात पर है कि प्रतिमा को किसी भी तरह का नुकसान नहीं होना चाहिए।
प्रतिमा के नीचे क्या है?
अब पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है। क्या प्रतिमा जमीन में बहुत गहराई तक स्थापित है? क्या नीचे कोई मजबूत आधार या पत्थर की संरचना है? क्या प्रतिमा का वजन और गुरुत्व केंद्र ऐसा है कि सामान्य क्रेन से उसे उठाना मुश्किल हो रहा है? या फिर प्रतिमा और जमीन के बीच ऐसी संरचना है, जिसका पता अभी तक नहीं चल पाया है?
इन्हीं सवालों के जवाब के लिए तकनीकी और पुरातात्विक जांच की जा रही है।
श्रद्धालुओं ने की महाआरती, हनुमान चालीसा का पाठ
जैसे-जैसे प्रतिमा के नहीं हिलने की खबर फैलती गई, वैसे-वैसे श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगी। मंगलवार शाम वहां महाआरती, ढोल-ताशे और हनुमान चालीसा का पाठ हुआ।
लोगों ने प्रशासन से मांग की कि प्रतिमा को उसी स्थान पर रहने दिया जाए। श्रद्धालुओं और हिंदू संगठनों का कहना है कि सड़क चौड़ीकरण जरूरी हो सकता है, लेकिन प्रतिमा को हटाना ही एकमात्र विकल्प नहीं है।
पुजारी ने रखी लिखित गारंटी की शर्त
मामला अब सिर्फ मशीन और इंजीनियरिंग तक सीमित नहीं है।मंदिर के पुजारी सुलभ शांतनु शर्मा और मंदिर समिति के सदस्यों ने प्रतिमा को हटाने पर आपत्ति जताई है। उनकी मांग है कि अगर प्रतिमा को दूसरी जगह ले जाना ही है तो प्रशासन पहले लिखित गारंटी दे कि प्रतिमा को बिना किसी नुकसान के सुरक्षित तरीके से टंकी चौक पर स्थापित किया जाएगा।
170 साल पुराना मंदिर, प्रतिमा इससे भी पुरानी होने का दावा
मंदिर को करीब 170 साल पुराना बताया जा रहा है।
हालांकि प्रतिमा की वास्तविक उम्र को लेकर अलग-अलग दावे हैं। कुछ विशेषज्ञों ने इसे इससे कहीं अधिक पुराना बताया है और इसकी शिल्प शैली को पुराने मालवा क्षेत्र की मूर्ति निर्माण परंपरा से जोड़कर देखा है।
आस्था कहती है- हनुमान जी खुद नहीं हटना चाहते
प्रतिमा के बार-बार नहीं हिलने के बाद स्थानीय श्रद्धालुओं में एक धारणा मजबूत हो गई है। लोगों का कहना है कि अगर भगवान हनुमान की इच्छा होती तो प्रतिमा आसानी से स्थानांतरित हो जाती।लगातार कोशिशों के बाद भी प्रतिमा के अपनी जगह पर बने रहने को श्रद्धालु दैवी संकेत और भगवान की इच्छा मान रहे हैं।
दूसरी तरफ प्रशासन और तकनीकी विशेषज्ञ इसे धार्मिक चमत्कार घोषित करने के बजाय संरचनात्मक और तकनीकी समस्या के रूप में देख रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल- आगे क्या होगा?
फिलहाल खड़े हनुमान जी की प्रतिमा अपनी मूल जगह पर ही है। मंदिर का भवन और चाहरदीवारी हट चुकी है। प्रतिमा को फिलहाल टेंट लगाकर सुरक्षित रखा गया है।प्रशासन विशेषज्ञों की रिपोर्ट और तकनीकी सलाह के आधार पर आगे की रणनीति तय करेगा।अगर प्रतिमा को हटाया जाता है तो उसे सुरक्षित तरीके से दूसरी जगह स्थापित करना होगा। लेकिन अगर तकनीकी जांच में यह सामने आता है कि प्रतिमा को हटाने में नुकसान का खतरा है, तो प्रशासन को सड़क चौड़ीकरण की योजना पर भी दोबारा विचार करना पड़ सकता है।
















