कैंसर की दवाओं की कीमतों में कटौती से कितनी राहत? कीट्रूडा समेत कई महंगी दवाओं के दाम जस के तस

कैंसर के इलाज का खर्च कम करने की दिशा में सरकार के कदम से मरीजों को राहत मिलने की उम्मीद है, लेकिन यह राहत सभी दवाओं पर समान रूप से लागू नहीं होगी। कई बेहद महंगी कैंसर दवाओं की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इनमें इम्यूनोथेरेपी की चर्चित दवा कीट्रूडा भी शामिल है, जिसकी कीमत अब भी 2,16,500 रुपये बनी हुई है। वहीं, ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली रिबोसाइक्लिब की कीमत 24,435 रुपये पर स्थिर है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि कैंसर की दवाओं पर खर्च घटाने की पहल का लाभ मरीजों तक कितनी व्यापकता से पहुंचेगा।
कीट्रूडा समेत कई महंगी दवाओं पर राहत नहीं
कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कई महंगी दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इनमें कीट्रूडा के अलावा टैग्रिसो, टेसेंट्रिक, डार्ज़ालेक्स और इम्फिन्ज़ी जैसी दवाएं भी शामिल हैं। कीट्रूडा का इस्तेमाल 21 से अधिक प्रकार के कैंसर के उपचार में किया जाता है, लेकिन इसकी कीमत में कटौती नहीं हुई है। इसी तरह, ब्रेस्ट कैंसर के उपचार में इस्तेमाल होने वाली रिबोसाइक्लिब की कीमत भी 24,435 रुपये ही बनी हुई है। इन दवाओं की ऊंची कीमतें उन मरीजों और परिवारों के लिए बड़ी चुनौती हैं, जिन्हें लंबे समय तक इलाज कराना पड़ता है।
पेटेंट वाली दवाओं और मुफ्त दवा योजनाओं का मामला
मरीजों के हितों के लिए काम करने वाले समूह ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क (AIDAN) से जुड़ीं मालिनी ऐसोला ने महंगी दवाओं की कीमतों में बदलाव नहीं होने के पीछे एक अहम वजह बताई है। उनके मुताबिक, सरकार ने पेटेंट वाली उन दवाओं को कीमतों में कटौती के दायरे से बाहर रखा है, जिन्हें दवा कंपनियां पेशेंट असिस्टेंस प्रोग्राम (PAP) के तहत मुफ्त या रियायती दरों पर उपलब्ध कराती हैं। PAP के तहत कंपनियां डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन पर मिलने वाली दवाएं मरीजों को मुफ्त या भारी छूट के साथ देती हैं। उदाहरण के तौर पर, किसी मरीज को दो शीशियों की कीमत चुकाने पर तीसरी शीशी मुफ्त दी जा सकती है।
ऐसोला का कहना है कि उनका संगठन इन कार्यक्रमों को कीमतों के नियमन के दायरे से बाहर रखने के पक्ष में नहीं रहा है। उनके अनुसार, ऐसी व्यवस्था से अस्पतालों और बिचौलियों को मुनाफा कमाने का अवसर मिल सकता है। इसलिए केवल मुफ्त दवा उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर निर्भर रहने के बजाय कीमतों और कारोबार में शामिल पक्षों के मार्जिन पर भी निगरानी जरूरी है।
42.8 प्रतिशत तक मुनाफे के मार्जिन पर सवाल
दवाओं की कीमतों में कटौती के बावजूद उनके कारोबार में मिलने वाले मार्जिन को लेकर भी चिंता जताई गई है। मालिनी ऐसोला के मुताबिक, कई मामलों में कीमतें तय करने के लिए अपनाए गए फॉर्मूले के तहत अस्पतालों या वितरकों को 42.8 प्रतिशत तक का मार्जिन मिल सकता है। उनका तर्क है कि यदि इतना ऊंचा मार्जिन रखने की अनुमति नहीं दी जाती, तो मरीजों के लिए दवाओं की कीमतें और कम हो सकती थीं। यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी दवा की कीमत में कमी का पूरा लाभ तभी मरीज तक पहुंच सकता है, जब वितरण और बिक्री की प्रक्रिया में लगने वाले अतिरिक्त खर्च तथा मुनाफे पर भी प्रभावी नियंत्रण हो।
सुप्रीम कोर्ट में भी उठा दवाओं के मुनाफे का मुद्दा
कैंसर की दवाओं की बढ़ती कीमतों और दवा कारोबार में रखे जाने वाले मार्जिन का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। अदालत देश में मूल्य नियंत्रण के दायरे से बाहर रहने वाली दवाओं पर भी ट्रेड मार्जिन की सीमा तय करने के मुद्दे पर विचार कर रही है। इस मामले में अदालत ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। यदि दवाओं के कारोबार में मार्जिन की सीमा तय होती है, तो इसका असर उन दवाओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है, जो फिलहाल प्रत्यक्ष मूल्य नियंत्रण के दायरे से बाहर हैं। हालांकि, इसका अंतिम प्रभाव अदालत के आदेश और सरकार की ओर से लागू किए जाने वाले नियमों पर निर्भर करेगा।
सिर्फ दवाएं सस्ती होने से इलाज का खर्च नहीं होगा कम
कैंसर का उपचार केवल दवाएं खरीदने तक सीमित नहीं है। मरीजों को सर्जरी, विभिन्न जांचों, अस्पताल में भर्ती, डॉक्टरों की फीस और कई बार लंबे समय तक चलने वाले उपचार पर भी बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है। ऐसे में दवाओं की कीमतों में कमी निश्चित रूप से राहत दे सकती है, लेकिन इससे इलाज का कुल खर्च अपने आप कम नहीं हो जाता।
मरीजों को वास्तविक राहत देने के लिए जरूरी है कि कीमतों में कटौती का लाभ अधिक से अधिक दवाओं तक पहुंचे और अस्पतालों तथा वितरकों के मार्जिन की भी प्रभावी निगरानी हो। खासकर उन महंगी दवाओं के मामले में यह सवाल महत्वपूर्ण है, जिनका इस्तेमाल गंभीर बीमारियों के लंबे और खर्चीले उपचार में किया जाता है।
9 नवंबर से लागू होंगी संशोधित कीमतें
राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) के फैसले के तहत 137 नॉन-शेड्यूल कैंसर दवाओं के ट्रेड मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के 30 प्रतिशत तक सीमित किया गया है। इसके बाद संशोधित कीमतें 9 नवंबर से लागू होंगी। हालांकि, इस फैसले से मिलने वाली राहत और कीट्रूडा जैसी महंगी दवाओं की कीमतों में बदलाव नहीं होने के बीच अंतर को समझना जरूरी है। कीमतों में कटौती की पहल से कई मरीजों को फायदा मिल सकता है, लेकिन सभी महंगी कैंसर दवाओं के सस्ता होने की गारंटी नहीं है। कैंसर के इलाज को अधिक किफायती बनाने के लिए मूल्य नियंत्रण, पारदर्शी वितरण व्यवस्था और मरीजों तक वास्तविक लाभ पहुंचना अहम होगा।

रांची में जन शिकायत समाधान कार्यक्रम, 236 आवेदन मिले; 184 का मौके पर निपटारा
रांची: रांची जिले के विभिन्न थानों और ओपी में बुधवार को जन शिकायत समाधान कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस दौरान पुलिस अधिकारियों…

31 अक्टूबर को कोरोमियां बलसेरा में सजेगा इंद मेला, नागपुरी कलाकार बिखेरेंगे सुरों का जादू
सिमडेगा: ठेठईटांगर प्रखंड के कोरोमियां बलसेरा में 31 अक्टूबर को इंद्रदेव पूजा समिति के तत्वावधान में भव्य इंद मेला एवं ठेठ नागपुरी…
















