झारखंड में डी. फार्मा परीक्षा और निजी कॉलेजों के निबंधन में 100 करोड़ के घोटाले का आरोप, बाबूलाल मरांडी ने CBI-ED जांच की मांग की
रांची: झारखंड के नेता प्रतिपक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने राज्य में डिप्लोमा इन फार्मेसी (डी. फार्मा) की परीक्षा, निजी फार्मेसी कॉलेजों के निबंधन और मान्यता से जुड़े कथित बड़े घोटाले की जांच केंद्रीय जांच एजेंसियों से कराने की मांग की है। इस संबंध में उन्होंने 2 नवंबर 2026 को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर पूरे मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) से कराने का आग्रह किया है। मरांडी ने अपने पत्र में आरोप लगाया है कि डी. फार्मा परीक्षा और निबंधन की आड़ में 100 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध वसूली की गई। उन्होंने इसे राज्य के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग में व्याप्त कथित भ्रष्टाचार, राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक मिलीभगत का गंभीर मामला बताया है।

2007 में गठित परीक्षा समिति से शुरू हुआ विवाद
मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में बाबूलाल मरांडी ने पूरे प्रकरण की शुरुआत वर्ष 2007 में गठित डिप्लोमा इन फार्मेसी परीक्षा समिति से जोड़ी है। उनके अनुसार, वर्ष 2011 में इस समिति का पुनर्गठन किया गया था। मरांडी ने आरोप लगाया कि वर्ष 2018 में तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव निधि खरे और बाद में तत्कालीन प्रधान सचिव डॉ. नितिन मदन कुलकर्णी ने परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से वर्ष 2019-20 से डी. फार्मा की सभी परीक्षाओं का संचालन झारखंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी (JUT) को सौंपने का निर्णय लिया था। इस निर्णय की जानकारी फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) को भी दी गई थी। पत्र के मुताबिक, परीक्षा संचालन JUT को सौंपे जाने से फर्जी उपस्थिति, परीक्षा और निबंधन शुल्क की वसूली तथा निजी संस्थानों पर कथित माफिया नियंत्रण समाप्त हो सकता था। हालांकि, मरांडी का आरोप है कि विभागीय दबाव के कारण JUT के अधिकार क्षेत्र को केवल एक सरकारी कॉलेज तक सीमित कर दिया गया और 153 निजी संस्थानों की परीक्षाओं का संचालन दोबारा पुरानी समिति के माध्यम से शुरू करा दिया गया।

154 से 156 निजी संस्थानों को संरक्षण देने का आरोप
बाबूलाल मरांडी ने पत्र में आरोप लगाया है कि इस कथित व्यवस्था का उद्देश्य बिना पर्याप्त आधारभूत सुविधाओं वाले निजी फार्मेसी संस्थानों को संरक्षण देना था। उन्होंने दावा किया कि लगभग 154 से 156 निजी फार्मेसी संस्थान केवल कागजों पर संचालित हो रहे थे। इन संस्थानों के पास आवश्यक भूमि, प्रयोगशाला, पुस्तकालय और योग्य शिक्षकों की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी, जबकि राज्य में निर्धारित मानकों के अनुरूप केवल आठ संस्थान ही स्वीकृत थे।
पत्र में यह भी आरोप लगाया गया है कि दलालों के माध्यम से फर्जी मुहर लगाकर 500 घंटे की अनिवार्य क्लिनिकल ट्रेनिंग के प्रमाणपत्र तैयार किए गए और हजारों अयोग्य छात्रों का फर्जी निबंधन कर उन्हें अस्पतालों तथा दवा दुकानों में जीवनरक्षक दवाएं वितरित करने की अनुमति मिल गई।मरांडी के अनुसार, भारी जनविरोध के बाद सरकार ने लगभग 78 संस्थानों की मान्यता रद्द करने की कार्रवाई की। उन्होंने इसे पूर्व में दी गई मान्यताओं में कथित अनियमितताओं का प्रमाण बताया है।
तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव ने की थी कार्रवाई की अनुशंसा
पत्र में तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव अरुण कुमार सिंह की भूमिका का भी उल्लेख किया गया है। मरांडी के अनुसार, तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव ने फाइलों की समीक्षा के दौरान निजी कॉलेजों में फर्जी दाखिले और गैर-कानूनी संचालन की परतें उजागर की थीं। उन्होंने जिम्मेदार अधिकारियों को बर्खास्त करने और सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा की थी। मरांडी ने आरोप लगाया कि तत्कालीन विभागीय मंत्री ने संबंधित फाइल पर कार्रवाई करने के बजाय उसे दबा दिया, जिससे कथित अवैध वसूली का तंत्र चलता रहा और इससे जुड़े लोगों को लाभ मिलता रहा।
रजिस्ट्रार की नियुक्ति पर भी उठाए सवाल
बाबूलाल मरांडी ने राज्य फार्मेसी काउंसिल के स्थायी रजिस्ट्रार की नियुक्ति को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।
उनके पत्र के अनुसार, स्थायी रजिस्ट्रार के असामयिक निधन के बाद लगभग छह महीने तक पद रिक्त रखा गया। इस दौरान सचिवालय में कथित तौर पर सौदेबाजी की गई और अंततः बाहरी व्यक्ति प्रशांत कुमार पांडेय को रजिस्ट्रार-सह-सचिव के पद पर नियुक्त कर दिया गया।
मरांडी ने इस नियुक्ति को प्रशासनिक नियमों की अनदेखी और कथित मिलीभगत का हिस्सा बताया है।
हाईकोर्ट से स्टे मिलने के बाद परीक्षा और निबंधन पर रोक
पत्र में वर्तमान घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक शिकायतों के बाद राज्य सरकार ने कार्यालय आदेश संख्या 0-237(8), दिनांक 17 अगस्त 2026 के तहत प्रशांत कुमार पांडेय को पदमुक्त कर दिया था। इसके बाद उन्होंने झारखंड हाईकोर्ट में रिट याचिका (W.P.(S) No. 6423/2026) दायर कर 20 अगस्त 2026 को स्थगन आदेश (Stay) प्राप्त कर लिया।
मरांडी के अनुसार, विभाग के संयुक्त सचिव द्वारा 29 अक्टूबर 2026 को जारी पत्र के माध्यम से अगले आदेश तक डी. फार्मा की सभी परीक्षाओं और फार्मेसियों के निबंधन कार्यों पर रोक लगा दी गई है।उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासनिक आदेशों और न्यायिक प्रक्रियाओं के बीच हजारों विद्यार्थियों का भविष्य अधर में लटक गया है।
बाबूलाल मरांडी ने की तीन प्रमुख मांगें
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को लिखे पत्र में बाबूलाल मरांडी ने पूरे मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
उन्होंने प्रमुख रूप से निम्नलिखित मांगें रखी हैं:
1. ED जांच: लगभग 100 करोड़ रुपये की कथित अवैध वसूली, मनी लॉन्ड्रिंग और तत्कालीन मंत्री एवं अधिकारियों की कथित अवैध संपत्तियों की प्रवर्तन निदेशालय से जांच कराई जाए।
2. CBI जांच: फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया के निर्देशों की कथित अवहेलना, रजिस्ट्रार की संदिग्ध नियुक्ति और अंतरराज्यीय माफिया नेटवर्क की जांच CBI को सौंपी जाए।
3. CID/SIT जांच: फर्जी प्रमाणपत्रों और जाली अस्पताल ट्रेनिंग दस्तावेजों की फॉरेंसिक जांच कराई जाए तथा दोषियों के खिलाफ गैर-जमानती धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कर कार्रवाई की जाए।
युवाओं के भविष्य से जुड़ा मामला
बाबूलाल मरांडी ने कहा है कि यह मामला केवल प्रशासनिक अनियमितताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि झारखंड के हजारों युवाओं के भविष्य और राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। उन्होंने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि केवल विभागीय पत्राचार के माध्यम से इस मामले को समाप्त न किया जाए, बल्कि केंद्रीय जांच एजेंसियों को जांच सौंपकर पूरे कथित भ्रष्टाचार तंत्र का पर्दाफाश किया जाए।

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