क्या इंश्योरेंस कंपनियां सिर्फ प्रीमियम वसूलने के लिए हैं? हाईकोर्ट के फैसले ने इंश्योरेंस कंपनियों को दिखाया आईना
रांची / पलामू: सड़क दुर्घटना में किसी अपने को खो देने का दर्द वही समझ सकता है जिस परिवार पर दुखों का पहाड़ टूटता है। लेकिन जब पीड़ित परिवार न्याय और मुआवजे के लिए कानूनी चौखट पर पहुंचता है, तो बीमा कंपनियां (Insurance Companies) तकनीकी कमियों और कानूनी पेचीदगियों का बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारी से भागने की पूरी कोशिश करती हैं।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!झारखंड हाईकोर्ट ने हाल ही में आईसीआईसीआई लोंबार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (ICICI Lombard) से जुड़े एक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए बीमा कंपनियों की इस मनमानी पर करारा प्रहार किया है। अदालत ने न केवल बीमा कंपनी की अपील खारिज की, बल्कि पीड़ित परिवार के मुआवजे की रकम को बढ़ाकर 11.90 लाख रुपये करने का आदेश दिया।
क्या था पूरा मामला?
मामला पलामू जिले के लेस्लीगंज थाना क्षेत्र के दुगिला गांव का है। स्वर्गीय बुद्धदेव दुबे की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। उनके पीछे उनकी पत्नी गायत्री कुअर और चार छोटे बेटे असहाय छोड़ गए थे।
पीड़ित परिवार ने पलामू ट्रिब्यूनल में मुआवजे का दावा किया। ट्रिब्यूनल ने बीमा कंपनी को 7.10 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। लेकिन अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए ICICI Lombard कंपनी ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर दी।

बीमा कंपनी का तर्क था कि:
दुर्घटनाग्रस्त वाहन के पास घटना के दिन वैध रोड परमिट (Road Permit) नहीं था।
इसलिए कंपनी को “Pay and Recover” (पहले भुगतान करे फिर मालिक से वसूले) का अधिकार मिले या उसे जिम्मेदारी से मुक्त किया जाए।
जनता से जुड़े 3 बड़े सवाल और हाईकोर्ट का कड़ा रुख
1. हवा-हवाई आरोपों से नहीं बच सकतीं कंपनियां (साबित करने की जिम्मेदारी कंपनी की)
अक्सर देखा जाता है कि बीमा कंपनियां कागजातों की कमी का हवाला देकर दावा खारिज कर देती हैं। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि बीमा कंपनी यह दावा करती है कि नीति (Policy) की शर्तों का उल्लंघन हुआ है, तो इसे साबित करने का ठोस सबूत भी कंपनी को ही कोर्ट में पेश करना होगा। केवल लिखित जवाब में मालिक से कागजात मांगना काफी नहीं है।
2. बिना कागजी सबूत के भी मजदूर/किसान की सही कमाई मानना जरूरी: हमारे देश और राज्य में लाखों लोग ऐसे हैं जो खेती, छोटे ठेकेदारी या असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। उनके पास सैलरी स्लिप या आईटीआर (ITR) नहीं होता। ट्रिब्यूनल ने लिखित प्रमाण न होने पर मृतक की आय केवल 6,000/माह मानी थी। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कागजी सबूत न होने का मतलब यह नहीं कि इंसान की कमाई सबसे कम मान ली जाए। कोर्ट ने मृतक की आय 8,000 प्रति माह तय की और भविष्य की संभावनाओं (Future Prospects) को जोड़कर मुआवजा बढ़ाया।
3. अनाथ हुए बच्चों और विधवा को मिला न्याय का हक : हाईकोर्ट ने न सिर्फ मृतक की आय का सही आकलन किया, बल्कि परिवार के 5 आश्रितों को ध्यान में रखते हुए ₹2 लाख का कंसोर्टियम (सहानुभूति राशि), अंतिम संस्कार खर्च और संपत्ति के नुकसान की भरपाई का भी आदेश दिया।
मुआवजे का पूरा हिसाब: किसे कितना मिलेगा?
कोर्ट के आदेशानुसार कुल मुआवजा 14.90 लाख तय हुआ, जिसमें से पूर्व में मिली राहत राशि घटाकर 11,90,000/- की शुद्ध राशि तय की गई:
आश्रितों के लिए तय मुआवजा: 12,60,000/-
पारंपरिक मद (कंसोर्टियम, अंतिम संस्कार आदि): 2,30,000/-
कुल राशि: 14,90,000/-
घटाया गया अंतरिम भुगतान: – 3,00,000/- (मालिक व अंतरिम राहत से प्राप्त)
अंतिम देय राशि: 11,90,000/- (साथ में दावा करने की तिथि से 6% वार्षिक ब्याज)
















