झारखंड हाईकोर्ट ने ठेकेदार पर लगी डिबारमेंट कार्रवाई रद्द की, JSBCCL को नए सिरे से नोटिस जारी करने की दी छूट
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रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में झारखंड स्टेट बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन लिमिटेड (JSBCCL) द्वारा एक निर्माण कंपनी पर लगाई गई डिबारमेंट (टेंडर प्रक्रिया से बाहर करने) की कार्रवाई को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि बिना उचित कारण बताओ नोटिस और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए ऐसी कार्रवाई नहीं की जा सकती।
यह मामला एम/एस गुप्ता कंस्ट्रक्शन की ओर से दायर याचिका से जुड़ा था। कंपनी ने वर्ष 2023 में जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उसे तब तक किसी नए टेंडर में भाग लेने से रोक दिया गया था, जब तक वह अपने अधूरे निर्माण कार्य को पूरा नहीं कर देती।

ठेका समाप्त होने के बाद डिबारमेंट अनिश्चितकालीन हो गई
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि बाद में वर्ष 2025 में JSBCCL ने संबंधित निर्माण अनुबंध ही समाप्त कर दिया। ऐसे में अब कंपनी के लिए अधूरा कार्य पूरा करना संभव नहीं रहा। इस स्थिति में वर्ष 2023 का डिबारमेंट आदेश व्यावहारिक रूप से अनिश्चितकाल के लिए लागू हो गया, जो कानून के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
JSBCCL ने क्या कहा?
कॉरपोरेशन की ओर से अदालत को बताया गया कि ठेकेदार को कई अवसर दिए गए, लेकिन उसने समय पर निर्माण कार्य पूरा नहीं किया। इसलिए यह निर्णय लिया गया कि जब तक कार्य पूरा नहीं होगा, तब तक उसके नए टेंडरों पर विचार नहीं किया जाएगा।

हाईकोर्ट ने क्या पाया?
मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि डिबारमेंट जैसी गंभीर कार्रवाई से पहले ठेकेदार को स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया गया था कि उसके खिलाफ ब्लैकलिस्ट या डिबारमेंट की कार्रवाई की जा सकती है।
अदालत ने यह भी कहा कि पहले जारी पत्र में केवल डिबारमेंट की अनुशंसा करने की बात कही गई थी, जबकि अंतिम आदेश सीधे कार्यकारी निदेशक द्वारा जारी कर दिया गया। इससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का समुचित पालन होता नहीं दिखता।

कोर्ट ने दिया नया मौका
हाईकोर्ट ने 26 जून 2023 का डिबारमेंट आदेश रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि यदि JSBCCL उचित समझे तो वह कानून के अनुसार नया कारण बताओ नोटिस जारी कर सकती है। नोटिस पर ठेकेदार का जवाब प्राप्त करने के बाद नियमानुसार आगे की कार्रवाई करने की स्वतंत्रता भी अदालत ने निगम को दी है।
फैसले की अहम बात
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने ठेकेदार के कार्य निष्पादन या अनुबंध विवाद के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है। फैसला केवल दो आधारों पर दिया गया है—पहला, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन और दूसरा, अनुबंध समाप्त हो जाने के बाद डिबारमेंट आदेश का अनिश्चितकाल तक प्रभावी हो जाना।
इस प्रकार हाईकोर्ट ने विवादित आदेश को निरस्त करते हुए याचिका का निस्तारण कर दिया, जबकि दोनों पक्षों के अन्य सभी अधिकार और दलीलें भविष्य के लिए सुरक्षित रखी गई हैं।















