प्रभु श्री कृष्ण नाम किसने रखा? कहाँ हुआ था कंस से छिपाकर कान्हा का नामकरण, क्यों पड़े ‘कृष्ण’ नाम? जन्माष्टमी पर जानिए सब कुछ ..
जन्माष्टमी 2026 स्पेशल: इस बार अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र का खास संयोग, जानिए घर पर पूजा की पूरी विधि और व्रत कब खोलें
रांची। आधी रात का समय था। मथुरा की जेल में देवकी-वसुदेव के घर एक बालक ने जन्म लिया। कंस के अत्याचार से बचाने के लिए वसुदेव उस बालक को यमुना पार कर गोकुल ले गए। वहां नंद बाबा और यशोदा के घर उसका पालन-पोषण हुआ। यही बालक आगे चलकर दुनिया में श्रीकृष्ण के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!लेकिन क्या आपको पता है कि कान्हा का नाम ‘कृष्ण’ किसने रखा था?
इसका जवाब श्रीमद्भागवत की कथा में मिलता है। कृष्ण और बलराम का नामकरण गर्गाचार्य ने किया था। खास बात यह थी कि यह नामकरण समारोह धूमधाम से नहीं हुआ, बल्कि कंस के जासूसों से बचने के लिए गुप्त रूप से किया गया।

कान्हा का नाम ‘कृष्ण’ कैसे पड़ा?
भागवत की कथा के अनुसार नंद बाबा ने गर्गाचार्य से अपने दोनों बच्चों का नामकरण संस्कार करने का आग्रह किया। गर्गाचार्य यदुवंश के कुलपुरोहित थे।
लेकिन उन्होंने नंद को सावधान किया कि यदि कंस को पता चल गया कि यदुवंश के पुरोहित ने नंद के घर आकर नामकरण संस्कार किया है, तो उसे इस बालक की असली पहचान पर शक हो सकता है।
इसलिए नामकरण संस्कार एकांत में कराया गया।
गर्गाचार्य ने बालक के श्याम वर्ण को देखते हुए उसका नाम कृष्ण बताया। उन्होंने यह भी कहा कि यह बालक पहले अलग-अलग युगों में अलग-अलग वर्णों में प्रकट हुआ है।
यही नहीं, गर्गाचार्य ने उसके भविष्य के बारे में भी संकेत दिए। उन्होंने कहा कि अपने गुणों और कर्मों के कारण यह बालक आगे चलकर अनेक नामों से प्रसिद्ध होगा।
इसलिए कृष्ण का नाम केवल एक नाम नहीं रहा। आगे चलकर वे गोपाल, गोविंद, माधव, मुरलीधर, नंदलाल, यशोदानंदन और वासुदेव जैसे अनेक नामों से पुकारे गए।
एक ही बालक के दो परिवारों की कहानी
कृष्ण की कहानी का सबसे भावुक पक्ष यह है कि उनके जन्मदाता माता-पिता देवकी और वसुदेव थे, लेकिन उनका बचपन नंद और यशोदा के घर बीता।
मथुरा में जन्म और गोकुल में पालन-पोषण की यही कहानी कृष्ण को एक साथ वासुदेव भी बनाती है और नंदलाल भी।
कंस के अत्याचार से बचाने के लिए वसुदेव नवजात कृष्ण को रात में गोकुल लेकर पहुंचे थे। इसके बाद यशोदा और नंद ने उनका पालन-पोषण किया।
इस बार की जन्माष्टमी क्यों है खास?
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर 2026, शुक्रवार को मनाई जा रही है।
इस बार पंचांग में कृष्ण पक्ष की अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र का संयोग खास चर्चा में है। कृष्ण जन्म की धार्मिक परंपरा में अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और मध्यरात्रि का विशेष महत्व माना जाता है। इस वजह से 2026 की जन्माष्टमी को भक्त विशेष मान रहे हैं।
अष्टमी तिथि 4 सितंबर को तड़के करीब 2:25 बजे शुरू होकर 5 सितंबर की रात 12:13 बजे तक रहने की जानकारी दी गई है। रोहिणी नक्षत्र भी 4 सितंबर को दिन के बड़े हिस्से में रहेगा और रात करीब 11:04 बजे तक रहने की गणना बताई गई है।
यही वजह है कि इस बार जन्माष्टमी की रात को लेकर भक्तों में खास उत्साह है।
जन्माष्टमी की रात कब होगा कृष्ण जन्म?
कृष्ण जन्म का उत्सव निशीथ काल, यानी आधी रात के आसपास किया जाता है।
दिल्ली के लिए इस वर्ष निशीथ पूजा का समय लगभग रात 11:57 बजे से 12:43 बजे तक बताया गया है। हालांकि अलग-अलग शहरों में समय कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है।
घर पर ऐसे करें श्रीकृष्ण की पूजा
जन्माष्टमी के दिन सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें। घर और पूजा स्थान की सफाई करें।
पूजा सामग्री
– बाल गोपाल या श्रीकृष्ण की प्रतिमा
– पीले वस्त्र
– पंचामृत
– दूध और दही
– गंगाजल या स्वच्छ जल
– चंदन
– फूल
– तुलसी दल
– माखन-मिश्री
– फल और मिठाई
– दीपक और धूप
– भगवान के लिए छोटा झूला
पूजा की विधि
1. संकल्प लें
सुबह पूजा के समय भगवान कृष्ण का ध्यान करके व्रत का संकल्प लें।
2. बाल गोपाल का श्रृंगार करें
रात की पूजा से पहले भगवान की प्रतिमा को सजाएं। पीले वस्त्र पहनाएं और फूल-माला लगाएं।
3. पंचामृत से अभिषेक करें
दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बने पंचामृत से भगवान का अभिषेक करें। इसके बाद स्वच्छ जल से स्नान कराएं।
4. तुलसी और फूल चढ़ाएं
भगवान कृष्ण को तुलसी दल अर्पित करें।
5. माखन-मिश्री का भोग लगाएं
कृष्ण के बाल स्वरूप से माखन का विशेष संबंध माना जाता है। माखन-मिश्री के साथ फल, मिठाई, खीर आदि का भोग लगाया जा सकता है।
6. मंत्र जाप करें
पूजा के दौरान—
‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’
का जाप किया जा सकता है।
7. जन्म के समय आरती करें
निशीथ काल में शंख और घंटी बजाकर भगवान के जन्म का उत्सव मनाएं। आरती करें और भगवान को झूला झुलाएं।
8. प्रसाद बांटें
पूजा के बाद प्रसाद परिवार और श्रद्धालुओं में बांटें।
56 भोग जरूरी है क्या?
जन्माष्टमी पर 56 भोग लगाने की परंपरा काफी लोकप्रिय है। हालांकि घर में 56 तरह के व्यंजन बनाना जरूरी नहीं है। श्रद्धा के अनुसार माखन-मिश्री, फल, दूध, दही, खीर या अपनी क्षमता के अनुसार सात्विक भोग लगाया जा सकता है। 56 भोग की परंपरा कृष्ण की बाल लीलाओं और गोवर्धन पूजा से जुड़ी लोकप्रिय धार्मिक मान्यता से भी जोड़ी जाती है।
व्रत रखने वाले कब खोलें व्रत?
इसमें अलग-अलग परंपराएं हैं।
कई भक्त मध्यरात्रि में कृष्ण जन्म और पूजा के बाद व्रत खोलते हैं। वहीं धर्मशास्त्र आधारित गणना में अगले दिन निर्धारित पारण समय का पालन करने की परंपरा भी है।
2026 के लिए कुछ पंचांगों में 5 सितंबर को सुबह 6:01 बजे के बाद पारण का समय बताया गया है।
इसलिए व्रत रखने वाले अपने स्थानीय पंचांग और अपनी परंपरा के अनुसार पारण करें।
5 सितंबर को दही-हांडी
जन्माष्टमी के अगले दिन यानी 5 सितंबर 2026 को कई जगह दही-हांडी उत्सव मनाया जाएगा। इसमें ऊंचाई पर मटकी बांधी जाती है और गोविंदा की टोलियां मानव पिरामिड बनाकर उसे फोड़ती हैं।
यह उत्सव कृष्ण की बाल लीलाओं और माखन चुराने की लोकप्रिय कथा से जुड़ा हुआ है।
जन्माष्टमी सिर्फ जन्मोत्सव नहीं, एक संदेश भी है
कृष्ण का जन्म ऐसी परिस्थिति में हुआ जब मथुरा में कंस का अत्याचार चरम पर था। एक ओर कारागार, भय और अन्याय था, दूसरी ओर उसी अंधेरे में कृष्ण का जन्म हुआ।
यही कारण है कि जन्माष्टमी को केवल भगवान के जन्मदिन के रूप में नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म, अन्याय पर न्याय और अंधकार पर प्रकाश की जीत के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।

















