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खूंटी की कड़वी सच्चाई: जहाँ ‘विकास’ पहुंचता है, वहां सड़क-पुल नहीं, कंधे पर लादकर ले जाना पड़ता है प्रसव पीड़ा में तड़पती महिला को

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अड़की (खूंटी): क्या हम वाकई 21वीं सदी के उस दौर में जी रहे हैं जहाँ स्वास्थ्य सुविधाएं एक क्लिक की दूरी पर हैं? शायद खूंटी जिले के अड़की प्रखंड के सावमरांगबेड़ा गांव के लिए यह सवाल अभी भी एक मज़ाक है। रविवार को जो कुछ इस गांव में हुआ, उसने प्रशासनिक दावों की धज्जियां उड़ा दीं।

न एंबुलेंस का रास्ता, न पुल का सहारा

तोड़ांग पंचायत के इस सुदूर गांव में जब सोमवारी देवी को प्रसव पीड़ा शुरू हुई, तो परिवार के सामने दो ही रास्ते थे—या तो भगवान भरोसे घर में छोड़ दें या फिर मौत को मात देकर अस्पताल तक पहुंचें। गाँव तक एंबुलेंस के पहुंचने के लिए कोई सड़क नहीं है और बीच में खड़ी है करकरी नदी।

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वो खौफनाक सफर: उफनती नदी और कांपते कंधे

तस्वीरों में आप देख सकते हैं, कैसे सोमवारी देवी के पति मांगूछाता नाग और गांव के कुछ हिम्मतवर लोग उन्हें अपने कंधों पर उठाए हुए हैं। बारिश के कारण करकरी नदी पूरी तरह उफान पर है। पानी का बहाव इतना तेज है कि अच्छे-अच्छों के पैर डगमगा जाएं। ऐसे में एक गर्भवती महिला को कंधे पर लादकर नदी पार कराना किसी जंग जीतने से कम नहीं था।

सिर्फ एक नाम नहीं, एक ‘टापू’ है यह गांव

सावमरांगबेड़ा के लोगों के लिए मानसून का मतलब है—कैद। हर साल बारिश के मौसम में यह गांव बाहरी दुनिया से कटकर एक ‘टापू’ बन जाता है। यहाँ न एंबुलेंस पहुंच सकती है, न समय पर बीमार बुजुर्गों को इलाज मिल पाता है और न ही बच्चों की पढ़ाई सुचारू रूप से चल पाती है।

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि वे बीते कई सालों से पुल और पक्की सड़क की गुहार लगा रहे हैं। नेताओं के दौरे होते हैं, वायदे किए जाते हैं और चुनाव बीत जाते हैं, लेकिन स्थिति जस की तस है।

जाहिर है की सोमवारी देवी तो आज अस्पताल पहुंच गईं, लेकिन कल कौन होगा? क्या प्रशासन का इंतज़ार किसी बड़ी अनहोनी का है?

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