Supreme Court gets five new judges, President Murmu approves the appointments

जनता का धन की ‘कौड़ियों’ में बिक्री ! सुप्रीम कोर्ट ने बैंक-ARC-कॉरपोरेट की कथित साठगांठ पर जारी किया नोटिस

Supreme Court gets five new judges, President Murmu approves the appointments

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डेस्क : आम आदमी की पांच सौ रुपया का लोन भी हो तो बैंक वाले उसको फ़ोन sms कर परेशान कर देते है । यहाँ तक की आपका कोई बिजनेस लोन है और आप  बैंक से CC करवाये है तो बैंक आपसे Supplemental Deed of Hypothecation फॉर्म  भरवाता है। सरल भाषा में समझें तो इसका  मतलब होता है कि बैंक द्वारा दिए गए ऋण (Loan/CC/OD) के बदले व्यवसाय का स्टॉक, कच्चा माल, तैयार माल, मशीनरी आदि बैंक के पक्ष में गिरवी रखा जाता है।
सामान व्यवसायी के पास ही रहता है, लेकिन उस पर बैंक का कानूनी अधिकार होता है।यदि ऋण नहीं चुकाया जाता है, तो बैंक उस संपत्ति को जब्त कर वसूली कर सकता है। लेकिन बस सवाल यहीं से शुरू होता है क्या सिर्फ छोटे और मंझोले कारोबारियों के लिए यह नियम है .. क्योंकि

बैंकिंग जगत में पारदर्शिता और जवाबदेही पर एक बड़ा सवाल खड़ा करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने JKM Infra Projects Ltd. से जुड़े एक हाई-प्रोफाइल मामले में केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और देश के प्रमुख बैंकों को नोटिस जारी किया है। इस मौके पर कोर्ट की यह टिप्पणी बैंकिंग प्रणाली में उस कथित ‘मिलीभगत’ पर कड़ी टिप्पणी भी की है , जिसमें जनता का पैसा डूबाकर कर्जदारों को लाभ पहुंचाया जा रहा है।

1. 1,537 करोड़ का कर्ज, सिर्फ ₹73.5 करोड़ में ‘निपटारा’

वेबसाइट live law के मुताबिक यह मामला 2012-2015 के बीच नोएडा स्थित JKM Infra Projects Ltd. द्वारा लिए गए ऋण से शुरू होता है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के नेतृत्व वाले सात बैंकों के कंसोर्टियम ने कंपनी को भारी कर्ज दिया था।
याचिका के अनुसार, इस राशि का एक बड़ा हिस्सा, लगभग 902 करोड़ रुपये , शेल कंपनियों, संदिग्ध विक्रेताओं और फर्जी लेनदेन के जरिए डायवर्ट कर दिया गया। जब कंपनी कर्ज चुकाने में असमर्थ रही, तो इसका कुल बकाया 1,537 करोड़ तक पहुंच गया। चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरी राशि को पहले Prudent ARC और फिर Phoenix ARC को बेचा गया और अंत में महज 73.50 करोड़ रुपये में इसका ‘सेटलमेंट’ कर दिया गया। यानी बैंकों ने अपने दावे का 95% से अधिक हिस्सा छोड़ दिया।

2. सुप्रीम कोर्ट की ‘डीप-रूटेड नेक्सस’ पर तल्ख टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कड़ी टिप्पणी की और इसे केवल एक वित्तीय लेनदेन नहीं, बल्कि ‘गहरे गठजोड़’ (Deep-Rooted Nexus) का परिणाम बताया।

करदाताओं का पैसा: यह पैसा बैंकों का नहीं, बल्कि आम जनता का है। इसकी रिकवरी में ढिलाई बरतकर कर्जदारों को फायदा पहुँचाना स्वीकार्य नहीं है।

सिस्टम की विफलता: कोर्ट ने आश्चर्य जताया कि यदि उधार लेने वाली कंपनी के पास संपत्तियां थीं, तो बैंक इतनी कम राशि पर समझौता करने के लिए कैसे तैयार हो गए?

3. किन-किन संस्थाओं को हुआ नोटिस जारी?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की हर परत खोलने के लिए एक विस्तृत जांच का संकेत दिया है। कोर्ट ने निम्नलिखित पक्षों से अपना पक्ष रखने को कहा है:

नियामक और सरकारी संस्थान:वित्त मंत्रालय, गृह मंत्रालय, RBI, SEBI और SFIO (सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस)।
बैंकिंग समूह: State Bank of India, Canara Bank, Union Bank of India।

निजी संस्थाएं: Prudent ARC Ltd., Phoenix ARC Pvt. Ltd., JKM Infra Projects Ltd. और कंपनी के प्रमोटर गौरव जालान व वैभव जालान।

ऑडिटिंग संस्था: Ernst & Young (EY) को भी नोटिस भेजा गया है, जिसने कंपनी का फॉरेंसिक ऑडिट किया था।

4. ARC की भूमिका और बैंकिंग तंत्र का संकट

एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों (ARC) का मुख्य काम बैंकों के NPA को खरीदना और उसकी वसूली करना होता है, ताकि बैंक अपनी बैलेंस शीट को साफ रख सकें। लेकिन यह मामला उस ‘सेकेंडरी मार्केट’ पर सवाल उठाता है जहाँ कर्ज को बहुत कम दाम पर बेच दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट की यह जांच यह तय कर सकती है कि क्या बैंकों ने वास्तव में वसूली की कोशिश की या वे जानबूझकर कर्जदारों को ‘एग्जिट’ दिलाने में मदद कर रहे थे।

5. इस सुनवाई के दूरगामी परिणाम

यह सुनवाई केवल JKM Infra तक सीमित नहीं रहने वाली है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से:

1. सख्त नियम: भविष्य में ARC को NPA बेचने की प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और सख्त नियमों की आवश्यकता होगी।

2. जवाबदेही: यदि मिलीभगत साबित होती है, तो यह बैंकिंग अधिकारियों और प्रमोटरों के लिए कानूनी मुसीबत का बड़ा कारण बन सकता है।

3. रिकवरी में तेजी: बैंकों को अब ऋण समाधान (Resolution) के मामलों में ‘हेयरकट’ (Haircut) देने से पहले कोर्ट की सख्त निगरानी का सामना करना पड़ सकता है।

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