Hazaribag news

डिजिटल इंडिया की दौड़ में पीछे छूटा यह डाकघर: आजादी के बाद भी मिट्टी के मकान में चल रही सेवाएं

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हजारीबाग के टाटीझरिया स्थित पतंग पंचायत का डाकघर आजादी के बाद भी मिट्टी के मकान में चल रहा है। डिजिटल इंडिया में बदहाली का शिकार हो रहे इस डाकघर की पूरी रिपोर्ट पढ़ें।

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टाटीझरिया (हजारीबाग): एक ओर देश डिजिटल क्रांति की नई इबारत लिख रहा है और गांव-गांव तक ऑनलाइन सुविधाओं का जाल बिछाया जा रहा है, वहीं हजारीबाग जिले के टाटीझरिया प्रखंड की पतंग पंचायत का डाकघर आज भी उपेक्षा और बदहाली का शिकार है। हैरानी की बात यह है कि आजादी से पहले स्थापित यह डाकघर, आज़ादी के इतने दशक बाद भी एक कच्चे मिट्टी के मकान से संचालित हो रहा है।

ग्रामीणों का भरोसा, पर जर्जर भवन का डर

मिट्टी की दीवारों और जर्जर छत वाले इस छोटे से कमरे में चल रहे डाकघर पर आसपास के ग्रामीणों का अटूट भरोसा है। यह सिर्फ एक सरकारी कार्यालय नहीं, बल्कि उनके लिए आर्थिक सुरक्षा का केंद्र है। ग्रामीण यहाँ अपनी मेहनत की कमाई बचत खातों में जमा करते हैं और जरूरत पड़ने पर निकालते हैं।
लेकिन, बदलती तकनीक के दौर में यह डाकघर खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। यहाँ तैनात कर्मचारियों ने बताया कि बरसात के दिनों में छत से पानी टपकता है, जिससे कई बार महत्वपूर्ण रजिस्टर और सरकारी दस्तावेज भीगकर खराब हो चुके हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद कर्मचारी ग्रामीणों को सुकन्या समृद्धि योजना समेत केंद्र सरकार की विभिन्न लाभकारी योजनाओं से जोड़ने का काम कर रहे हैं।

सुविधाएं नदारद, उम्मीदें बरकरार

स्थानीय लोगों का कहना है कि जब देश भर में डाकघरों को आधुनिक और कंप्यूटरीकृत किया जा रहा है, तब पतंग पंचायत का यह डाकघर पक्के भवन और डिजिटल सुविधाओं के लिए तरस रहा है। बुनियादी सुविधाओं के अभाव में न केवल कामकाज प्रभावित हो रहा है, बल्कि सरकारी दस्तावेजों की सुरक्षा भी खतरे में है।

पतंग पंचायत के ग्रामीणों ने डाक विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और जिला प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि:

डाकघर के लिए तत्काल प्रभाव से पक्के भवन का निर्माण हो।

कार्यालय को कंप्यूटरीकृत (Computerized) किया जाए।

ग्रामीणों को सम्मानजनक और सुगम सेवाएं प्रदान करने के लिए आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।

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