The face of the Harmu River has changed over 14 years.

14 साल में बदल गई हरमू नदी की तस्वीर: सैटेलाइट इमेज में दिखा बढ़ता शहरीकरण, सिमटते खुले क्षेत्र

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The face of the Harmu River has changed over 14 years.

 

रांची:  मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने झारखंड में जल संरक्षण के लिए जल स्रोतों के किसी भी तरह का अतिक्रमण को तत्काल मुक्त करने का अभियान चलाया है । ताकि झारखंड पानी की समस्या उबर  सके  । लेकिन आज हम राजधानी रांची की पहचान और शहर के प्रमुख जल निकासी तंत्र का हिस्सा रही हरमू नदी को बीते 14 सालों से जानने समझने का प्रयास करेंगे। हरमू नदी के  आसपास का इलाका पिछले 14 वर्षों में तेजी से बदल गया है। सेटेलाइट इमेज में वर्ष 2011, 2015 और 2025 की सैटेलाइट तस्वीरों की तुलना करने पर यह साफ नजर आता है कि नदी के आसपास खुले क्षेत्रों में भारी कमी आई है और शहरीकरण का दबाव लगातार बढ़ा है।

हरमू नदी पुल क्षेत्र की 2011 की तस्वीरों में नदी के दोनों किनारों पर अपेक्षाकृत अधिक खुला भू-भाग दिखाई देता है। आसपास सीमित निर्माण थे और नदी का प्राकृतिक बहाव क्षेत्र स्पष्ट रूप से नजर आता था। नदी के किनारों पर हरित क्षेत्र भी मौजूद थे, जिससे वर्षा जल के प्राकृतिक प्रवाह और भू-जल पुनर्भरण की संभावना बनी रहती थी।

लेकिन वर्ष 2015 तक आते-आते तस्वीर बदलने लगी। कई खाली भूखंडों पर निर्माण गतिविधियां शुरू होती दिखाई देती हैं। सड़क किनारे व्यावसायिक और आवासीय विकास के संकेत मिलने लगते हैं। नदी के आसपास मानव हस्तक्षेप बढ़ने के साथ-साथ खुली जमीन का दायरा भी कम होने लगता है।

वर्ष 2025 की ताजा तस्वीरों में यह बदलाव और अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। हरमू नदी पुल के आसपास बड़े भवन, घनी आबादी और व्यावसायिक प्रतिष्ठान विकसित हो चुके हैं। जिन स्थानों पर पहले खाली जमीन या हरित क्षेत्र दिखाई देते थे, वहां अब पक्के निर्माण मौजूद हैं। नदी के दोनों किनारों पर शहरी विस्तार का दबाव साफ नजर आता है। इसके साथ ही नदी का प्राकृतिक स्वरूप भी पहले की तुलना में अधिक सीमित दिखाई देता है।

शहरीकरण बनाम नदी का अस्तित्व

लोगो का मानना है कि नदी के आसपास अनियोजित निर्माण गतिविधियां भविष्य में गंभीर समस्याओं को जन्म दे सकती हैं। नदी के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र में कमी आने से जल निकासी की क्षमता प्रभावित होती है। यही कारण है कि भारी बारिश के दौरान जलभराव, और शहरी बाढ़ जैसी घटनाएं बढ़ने लगती हैं।

हरमू नदी पहले से ही प्रदूषण, अतिक्रमण और जल प्रवाह में कमी जैसी समस्याओं से जूझ रही है। ऐसे में नदी किनारे बढ़ते निर्माण और कंक्रीटीकरण को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। विशेषज्ञों का कहना है कि नदी केवल जलधारा नहीं होती, बल्कि उसका पूरा कैचमेंट एरिया, बाढ़ क्षेत्र और तटीय भूभाग भी उसके अस्तित्व का हिस्सा होता है।

सैटेलाइट तस्वीरें क्या संकेत देती हैं?

सैटेलाइट तस्वीरों से स्पष्ट रूप से तीन बड़े बदलाव दिखाई देते हैं

नदी के आसपास खुले भू-भाग में कमी।

आवासीय एवं व्यावसायिक निर्माण में उल्लेखनीय वृद्धि।

हरित क्षेत्रों का सिकुड़ना और कंक्रीट संरचनाओं का विस्तार।

हालांकि केवल सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसी विशेष निर्माण में नदी भूमि पर अतिक्रमण किया है। लेकिन इसके लिए राजस्व विभाग अभिलेख, नगर निगम के नक्शे, भू-अर्जन रिकॉर्ड को खंगाला जाएगा तो सब साफ हो जाएगा।

जल संकट और पर्यावरण पर असर

वैसे शहरों में बढ़ता कंक्रीटीकरण वर्षा जल के जमीन में समाने की प्रक्रिया को बाधित करता है। इसका सीधा असर भू-जल स्तर पर पड़ता है। यदि नदी और उसके आसपास के प्राकृतिक क्षेत्रों का संरक्षण नहीं किया गया, तो भविष्य में जल संकट और शहरी बाढ़ जैसी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।

रांची में पिछले कुछ वर्षों से हरमू नदी के संरक्षण और पुनर्जीवन को लेकर कई योजनाएं बनाई गईं, लेकिन सैटेलाइट तस्वीरें यह सवाल खड़ा करती हैं कि क्या नदी के प्राकृतिक क्षेत्र को पर्याप्त सुरक्षा मिल पाई है।

उठ रहे हैं ये बड़े सवाल

क्या हरमू नदी का वास्तविक बहाव क्षेत्र वर्षों में सिमटा है?

नदी के आसपास हुए निर्माण पूरी तरह नियमों के अनुरूप हैं?

क्या नदी के कैचमेंट क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है?

बढ़ते शहरीकरण का नदी की जलधारण क्षमता पर कितना असर पड़ा है?

क्या भविष्य में हरमू नदी को बचाने के लिए विशेष संरक्षण योजना की आवश्यकता है?

जाहिर है की 14 वर्षों की सैटेलाइट तस्वीरें यह जरूर बताती हैं कि हरमू नदी के आसपास का भू-दृश्य तेजी से बदला है। अब जरूरत इस बात की है कि प्रशासन, पर्यावरण विशेषज्ञ और नागरिक समाज मिलकर यह सुनिश्चित करें कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बना रहे, ताकि राजधानी की इस महत्वपूर्ण नदी का अस्तित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रह सके।

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