The 'Saga of Corruption' Regarding Bridges in Jharkhand: ACB Gives Clean Chit, Yet Department Admits Major Irregularities Occurred

झारखंड में पुलों की ‘भ्रष्टाचार गाथा’: एसीबी की क्लीन चिट, विभाग ने माना- बड़ी गड़बड़ियाँ हुई हैं

The 'Saga of Corruption' Regarding Bridges in Jharkhand: ACB Gives Clean Chit, Yet Department Admits Major Irregularities Occurred

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रांची: झारखंड में पुल निर्माण में हुई अनियमितताओं को लेकर सरकारी तंत्र के दो अलग-अलग चेहरे सामने आए हैं। एक तरफ भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने अपनी जांच में सब कुछ ‘सामान्य’ बताते हुए क्लीन चिट दे दी, तो दूसरी ओर ग्रामीण अभियंत्रण विभाग ने हाईकोर्ट में शपथपत्र दाखिल कर उन पुलों में हुई भारी गड़बड़ियों पर अपनी मुहर लगा दी है।

एक ही मामला, दो अलग-अलग सच

मामला धनबाद स्थित बराकर नदी पर बने पुल के ढहने से जुड़ा है। वर्ष 2009 में पुल के ढहने के बाद 2010 में जांच एसीबी को सौंपी गई थी। सात साल की लंबी जांच के बाद, 2017 में एसीबी ने कोर्ट को बताया कि यह कोई भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि महज ‘तथ्यों की भूल’ थी और मामले को रफा-दफा कर दिया।

लेकिन, जब मामला हाईकोर्ट पहुँचा और विभाग ने अपनी आंतरिक फाइलों को खंगाला, तो एसीबी की रिपोर्ट की पोल खुल गई। विभागीय जांच में न केवल गंभीर खामियां पाई गईं, बल्कि दोषी ठेकेदार गणेश राम डोकानिया को 10 साल के लिए ब्लैकलिस्ट कर उसकी सिक्योरिटी राशि भी जब्त कर ली गई।

विभाग ने माना: चार जिलों में करोड़ों का ‘खेल’

हाइकोर्ट में ग्रामीण अभियंत्रण विभाग के सचिव मनोज कुमार द्वारा दाखिल शपथपत्र ने राज्य में पुल निर्माण की हकीकत को उजागर कर दिया है। विभाग ने स्वीकार किया है कि राज्य के चार जिलों—धनबाद, खूंटी, पलामू और गुमला—में बने 55.90 करोड़ रुपये की लागत वाले नौ पुलों के निर्माण में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां हुई हैं।

जिलेवार अनियमितताओं का ब्योरा:

धनबाद (बराकर नदी): 35 करोड़ – ठेकेदार ब्लैकलिस्ट।

गुमला (6 पुल): 14.50 करोड़ – इंजीनियरों पर कार्रवाई।

पलामू (कोयल नदी): 4.25 करोड़ – ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट किया गया (बाद में कोर्ट से राहत)।

खूंटी (ताजना नदी): 2.15 करोड़ – ठेकेदार से दोबारा पुल बनवाया गया।

धनबाद के 6 इंजीनियर नपे

विभागीय जांच में दोषी पाए गए धनबाद के छह अभियंताओं पर कड़ी कार्रवाई की गई है। इसमें जूनियर इंजीनियर से लेकर कार्यपालक अभियंता तक शामिल हैं। इन पर निलंबन के साथ-साथ वेतनवृद्धि रोकने और पदोन्नति पर रोक लगाने जैसी अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है।

कानून का ‘पेच’ और बेअसर होती कार्रवाई

हैरानी की बात यह है कि कई मामलों में विभागीय कार्रवाई के बावजूद ठेकेदार और इंजीनियर कोर्ट से राहत पाने में सफल रहे। गुमला के 20 इंजीनियरों की सजा कोर्ट के आदेश पर खत्म हुई, तो वहीं पलामू में कलसी बिल्डकॉन जैसी कंपनियों ने अदालती हस्तक्षेप से अपनी ब्लैकलिस्टिंग रद्द करवा ली।

पंकज कुमार यादव द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने इस मामले में कड़ी रुख अख्तियार किया था। समय पर जवाब नहीं देने के कारण विभाग पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था।

सवाल यह उठता है कि जब विभागीय जांच में गड़बड़ियां साबित हो रही हैं, तो एसीबी की शुरुआती जांच में चूक कहाँ हुई? क्या यह महज ‘तथ्यों की भूल’ थी या भ्रष्टाचारियों को बचाने की कोई सोची-समझी साजिश?

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