जितिया व्रत 3 अक्टूबर को: संतान की लंबी उम्र के लिए मां रखती हैं निर्जला उपवास, जानें जीमूतवाहन की कथा

सुप्रिया पाठक
रांची: संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना को लेकर माताओं द्वारा रखा जाने वाला जितिया व्रत इस बार 3 अक्टूबर, शनिवार को रखा जाएगा। इसे जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है। बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश समेत कई क्षेत्रों में इस व्रत को विशेष धार्मिक आस्था के साथ मनाया जाता है। कई जगह महिलाएं इस दिन निर्जला उपवास रखकर भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती हैं और व्रत कथा सुनती हैं।

जितिया व्रत की परंपरा तीन दिनों से जुड़ी मानी जाती है। 2 अक्टूबर को नहाय-खाय और सरगही-ओठगन की परंपरा होगी। इसके बाद 3 अक्टूबर को मुख्य व्रत रखा जाएगा। 4 अक्टूबर को पूजा-अर्चना के बाद पारण किया जाएगा। हालांकि, तिथि और पारण के समय में स्थानीय पंचांग के अनुसार अंतर हो सकता है।

नहाय-खाय से होती है शुरुआत
जितिया व्रत की शुरुआत नहाय-खाय की परंपरा से होती है। इस दिन महिलाएं स्नान के बाद शुद्ध और सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। इसके बाद अगले दिन निर्जला व्रत रखा जाता है। व्रत के दौरान संतान के स्वास्थ्य, दीर्घायु और कल्याण की कामना की जाती है।

जीमूतवाहन के त्याग से जुड़ी है व्रत कथा
जितिया व्रत की प्रसिद्ध कथा राजा जीमूतवाहन, नाग शंखचूड़ और पक्षीराज गरुड़ से जुड़ी है। कथा के अनुसार जीमूतवाहन ने एक वृद्ध नागिन को अपने पुत्र के लिए विलाप करते देखा। पूछने पर उन्हें पता चला कि नागों और गरुड़ के बीच ऐसी परंपरा थी, जिसके तहत एक नाग को गरुड़ के आहार के लिए भेजा जाता था। उस दिन शंखचूड़ की बारी थी। नागिन का विलाप देखकर जीमूतवाहन का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने शंखचूड़ की जगह स्वयं गरुड़ के सामने जाने का निर्णय लिया। कथा के अनुसार जीमूतवाहन ने नाग के लाल वस्त्र धारण किए और उस स्थान पर जाकर बैठ गए, जहां गरुड़ आने वाले थे।

गरुड़ ने जीमूतवाहन को नाग समझकर अपने पंजों में उठा लिया। जीमूतवाहन ने अपनी जान बचाने के लिए विरोध नहीं किया। बाद में जब गरुड़ को पता चला कि वह नाग नहीं बल्कि जीमूतवाहन हैं, तो उन्हें अपने किए पर पश्चाताप हुआ। कथा के अनुसार देवी गौरी की कृपा से जीमूतवाहन को जीवन मिला और गरुड़ ने नागों के प्रति अपना व्यवहार बदल दिया।

त्याग और संतान की रक्षा का संदेश
जितिया की कथा का मुख्य संदेश त्याग, करुणा और जीवन की रक्षा से जुड़ा है। इसी वजह से यह कथा पीढ़ियों से व्रत के साथ सुनी और सुनाई जाती रही है। कई स्थानों पर महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा करती हैं, लोकगीत गाती हैं और व्रत कथा सुनती हैं। इससे यह पर्व धार्मिक अनुष्ठान के साथ सामाजिक और पारिवारिक जुड़ाव का भी माध्यम बनता है।

कब है व्रत और पारण?
– 2 अक्टूबर: नहाय-खाय/सरगही-ओठगन
– 3 अक्टूबर: मुख्य जितिया/जीवित्पुत्रिका व्रत
– 4 अक्टूबर: पारण

पारण का सटीक समय स्थानीय पंचांग और सूर्योदय के आधार पर अलग-अलग हो सकता है। इसलिए व्रत रखने वाली महिलाएं अपने क्षेत्र के विश्वसनीय पंचांग या स्थानीय पुरोहित से समय की पुष्टि कर लें। निर्जला उपवास में लंबे समय तक पानी नहीं लिया जाता है। इसलिए गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और किसी बीमारी से पीड़ित लोगों को निर्जला व्रत रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।

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