Does the tribal mega-gathering in Ranchi not feature the faces of the Jharkhand movement activists?

रांची की आदिवासी महाजुटान पर IRS निशा उरांव के सवाल, बोलीं- पोस्टर में राहुल गांधी-हेमंत सोरेन, लेकिन झारखंड आंदोलनकारियों की तस्वीर क्यों नहीं?

रांची। मोरहाबादी मैदान में 30 अगस्त को आयोजित आदिवासी महाजुटान को लेकर अब भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी निशा उरांव ने सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने इस आयोजन को ‘आदिवासी महारैली’ कहे जाने पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन किसी एक आयोजन को पूरे आदिवासी समाज का प्रतिनिधि बताना उचित नहीं होगा।

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निशा उरांव ने रैली के पोस्टरों और आयोजन की पहचान को लेकर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि पोस्टर में राहुल गांधी और हेमंत सोरेन की तस्वीरें तो नजर आती हैं, लेकिन आदिवासी समाज के ऐतिहासिक नायकों और झारखंड आंदोलनकारियों को वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे हकदार हैं।

उन्होंने सवाल किया कि “ना बिरसा भगवान, ना सिद्धो-कान्हू, वीर बुद्धू भगत, तेलंगा खड़िया और ना ही कार्तिक उरांव—आखिर झारखंड के वीर आदिवासी पूर्वजों और आंदोलनकारियों की तस्वीरें क्यों नहीं?”

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इसे आदिवासी महारैली कहना गलत होगा’

निशा उरांव का कहना है कि रांची में हुआ आयोजन लोकतांत्रिक रूप से किसी भी समूह या संगठन की अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन इसे ‘आदिवासी महारैली’ कहना सही नहीं होगा।

उन्होंने दावा किया कि बड़ी संख्या में सरना आदिवासी इस आयोजन से दूरी बनाए हुए हैं। इसी आधार पर उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी राजनीतिक या सामाजिक आयोजन को पूरे आदिवासी समाज की आवाज के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकता है।

हालांकि, रैली के आयोजकों की ओर से इस दावे पर अलग पक्ष सामने आना बाकी है।

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परिसीमन पर भी निशा उरांव ने रखा अपना गणित

आदिवासी महाजुटान का प्रमुख मुद्दा प्रस्तावित परिसीमन और आदिवासी आरक्षित सीटों को लेकर चिंता रहा। इसी मुद्दे पर निशा उरांव ने मौजूदा विधानसभा सीटों और प्रस्तावित वृद्धि का अपना गणित सामने रखा है।

उनके मुताबिक वर्तमान में झारखंड विधानसभा की 81 सीटों में 28 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। यानी विधानसभा में एसटी आरक्षित सीटों का अनुपात करीब 34.5 प्रतिशत है।

निशा उरांव का दावा है कि यदि विधानसभा सीटों की संख्या में 50 प्रतिशत की वृद्धि वाला मॉडल लागू होता है तो कुल विधानसभा सीटें 81 से बढ़कर 121 हो सकती हैं और एसटी आरक्षित सीटें 28 से बढ़कर 42 हो सकती हैं।

इस स्थिति में भी उनके अनुसार एसटी सीटों का अनुपात करीब 34.5 प्रतिशत ही रहेगा।

2008 के परिसीमन से आदिवासी सीटें घटने का खतरा’

निशा उरांव ने अपने बयान में 2008 के कांग्रेस वाले परिसीमन से जुड़े प्रावधानों का हवाला देते हुए दावा किया कि इसके प्रभाव में झारखंड में आदिवासी आरक्षित विधानसभा सीटों की संख्या 28 से घटकर 22 हो सकती है।

उनका तर्क है कि यदि ऐसा होता है तो आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व को नुकसान पहुंचेगा। इसके मुकाबले वह विधानसभा सीटों में प्रस्तावित वृद्धि वाले मॉडल को आदिवासी प्रतिनिधित्व बनाए रखने के लिहाज से बेहतर विकल्प बता रही हैं।

हालांकि, अभी  121 विधानसभा सीट और 42 एसटी सीट वाला आंकड़ा अभी लागू परिसीमन व्यवस्था नहीं है, बल्कि उनके द्वारा बताए गए प्रस्तावित मॉडल का गणित है।

नए परिसीमन प्रस्ताव को लागू करने की मांग करेंगे’

निशा उरांव का कहना है कि आदिवासी आबादी के अनुपात में कमी की स्थिति में भी यदि विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ती है और उसी अनुपात में एसटी आरक्षित सीटें बढ़ती हैं, तो आदिवासी प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखा जा सकता है।

उन्होंने इसी आधार पर नए परिसीमन प्रस्ताव को स्वीकार करने की मांग की है।

उनका कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में 81 में 28 एसटी सीटें हैं, जबकि 50 प्रतिशत वृद्धि वाले मॉडल में 121 में 42 एसटी सीटें हो सकती हैं। उनके मुताबिक दोनों ही परिस्थितियों में आदिवासी प्रतिनिधित्व 34.5 प्रतिशत के आसपास बना रहेगा।

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