झारखंड में डायन प्रथा पर सख्ती जरूरी: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, पीड़ितों के पुनर्वास पर जोर
रांची : झारखंड में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों, विशेषकर डायन प्रथा (विच हंटिंग) जैसी अमानवीय कुप्रथा पर रोक लगाने और पीड़ितों के पुनर्वास को मजबूत करने की जरूरत पर शनिवार को एक महत्वपूर्ण कोलोकीयम में जोर दिया गया। यह कार्यक्रम झारखंड न्यायिक अकादमी के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ऑडिटोरियम में आयोजित हुआ।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!कार्यक्रम में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ (सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश एवं NALSA के कार्यकारी अध्यक्ष) मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए, जबकि न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह विशिष्ट अतिथि रहे। इसके अलावा न्यायमूर्ति महेश शरदचंद्र सोनक, न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे।
“संविधान अधिकार देता है, लेकिन जमीनी हकीकत अलग” – न्यायमूर्ति विक्रम नाथ
अपने संबोधन में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 महिलाओं को समानता, भेदभाव से मुक्ति और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देते हैं, लेकिन इनके क्रियान्वयन में गंभीर अंतर है। उन्होंने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराध केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि समाज की गहरी संरचनात्मक समस्या है, जहां कई बार हिंसा को सामान्य मान लिया जाता है।
डायन प्रथा पर विशेष टिप्पणी करते हुए उन्होंने इसे अमानवीय और लैंगिक हिंसा का गंभीर रूप बताया। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ अंधविश्वास नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता और पितृसत्ता से जुड़ा मुद्दा है, जिसे खत्म करने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और संवेदनशील कानून-व्यवस्था की जरूरत है।
“चुनौती कानून नहीं, उसके क्रियान्वयन की” – न्यायमूर्ति अमानुल्लाह
न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों और मॉब लिंचिंग जैसे मामलों में कानून और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस मौजूद हैं, लेकिन असली चुनौती उनके प्रभावी क्रियान्वयन की है। उन्होंने जिला स्तर पर लीगल संस्थाओं को अधिक सक्रिय और प्रो-एक्टिव होने की जरूरत बताई। साथ ही लंबित मामलों के त्वरित निष्पादन और न्यायिक प्रक्रिया में सुधार पर भी जोर दिया।
पीड़ितों के पुनर्वास को बनाना होगा केंद्र
कोलोकीयम में यह भी स्पष्ट किया गया कि न्याय केवल अपराधियों को सजा देने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि पीड़ितों के पुनर्वास को केंद्र में रखना जरूरी है। विधिक सेवा संस्थाओं को गांव-गांव तक पहुंचकर पीड़ितों को कानूनी सहायता, जागरूकता और मुआवजा दिलाने में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
कार्यक्रम में सहायता राशि भी वितरित
कार्यक्रम के दौरान विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं से जुड़ी महिलाओं, दुर्घटना पीड़ित परिवारों और ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित महिला को आर्थिक सहायता भी प्रदान की गई।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र का धन्यवाद ज्ञापन महिला, बाल विकास एवं समाज कल्याण विभाग के सचिव उमाशंकर सिंह ने किया, जबकि द्वितीय सत्र में कानूनी और तकनीकी विषयों पर विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए।

















