राज्यसभा चुनाव : अंकगणित का मायाजाल, क्या हेमंत सोरेन बनेंगे चाणक्य महागठबंधन की लगायेंगे नैया पार या होगा महा-संग्राम’?
आकाश सिंह
रांची: झारखंड की सियासत में राज्यसभा चुनाव की सरगर्मी चरम पर है। कांग्रेस ने अपने दिग्गज रणनीतिकार और मल्लिकार्जुन खरगे के करीबी प्रणव झा को मैदान में उतारकर चौंका दिया है। एक ओर जहाँ कांग्रेस इसे ‘संगठन के प्रति सम्मान’ बता रही है, वहीं दूसरी ओर BJP की नजरें महागठबंधन की अंदरूनी खींचतान पर टिकी हैं। लेकिन एक बात तो तय है की राज्य के मुखिया हेमंत सोरेन अगर चाह ले तो ही कांग्रेस की नैया पार होगी । क्योंकि हेमंत सोरेन महागठबंधन के सर्वमान्य नेता है और बीते कुछ सालों में उन्होंने जो अपनी छवि बनाई है उसने हेमंत सोरेन को जननेता बना दिया है महागठबंधन की भार अपने कंधों पर लेकर हेमंत सोरेन ने विधानसभा में कांग्रेस की नैया पार लगाई थी ।
गणित का ‘मायाजाल’: क्या हेमंत सोरेन होंगे चाणक्य?
राज्यसभा की एक सीट के लिए 28 वोटों का जादुई आंकड़ा चाहिए।
महागठबंधन: कुल 56 वोट , झामुमो (34) और कांग्रेस (16) RJD (4) CPIML (2) के साथ मिलकर यह आंकड़ा आसानी से पार किया जा सकता है। लेकिन पेच यहाँ फँसा है कि क्या झामुमो अपने कोटे से कांग्रेस को अतिरिक्त वोट देने का ‘बड़ा दिल’ दिखाएगा? क्या RJD कांग्रेस का साथ देगी ? क्या वाम दल कांग्रेस के साथ खड़ी होगी ? सब कुछ हेमंत सोरेन के हांथ में है । झारखंड में हेमंत सोरेन के एक इशारे पर पूरा चुनाव निर्विरोध के जैसा हो जाएगा । बस देखना है की हेमंत सोरेन क्या निर्णय लेते है।
भाजपा की उम्मीद: 24 की संख्या बल पर खड़ी BJP को जीत के लिए 4 वोटों की दरकार है। भाजपा की पूरी उम्मीद ‘क्रॉस वोटिंग’ पर टिकी है। क्या महागठबंधन का कोई खेमा छिटकेगा? यह सवाल राज्य के गलियारों में चर्चा का विषय है।
‘निर्विरोध’ की अपील और ‘मैदान’ की तैयारी
झामुमो के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य के “चुनाव निर्विरोध होगा” वाले बयान ने सियासी पारे को ठंडा रखने की कोशिश की है, लेकिन BJP की खामोशी एक बड़े तूफान का संकेत हो सकती है। पांच राज्यों के लिए अपने पत्ते खोलने वाली भाजपा ने झारखंड से अभी किसी का नाम घोषित नहीं किया है। क्या यह कोई गहरी चुनावी चाल है?
प्रणव झा: ‘बैकरूम’ से सीधा ‘राजपथ’ तक
वैसे कहलगांव के अनादिपुर गांव से निकलकर बोकारो की गलियों में पले-बढ़े प्रणव झा, कांग्रेस के लिए एक ‘स्मार्ट चॉइस’ हैं। 1991 में छात्र राजनीति से शुरू हुआ उनका सफर अब देश के सबसे बड़े सदन तक पहुँचने के मुहाने पर है। वे न केवल मीडिया प्रबंधन के माहिर हैं, बल्कि दिल्ली और रांची के बीच की कड़ी को मजबूती से जोड़ते हैं। उनका नाम आगे करना इस बात का संकेत है कि कांग्रेस अब झारखंड में अपनी धमक को राष्ट्रीय स्तर पर जोड़ना चाहती है।
जाहिर है की झारखंड में राज्यसभा चुनाव केवल एक सीट का मुकाबला नहीं है, बल्कि यह विधानसभा चुनावों से पहले महागठबंधन की एकजुटता का ‘लिटमस टेस्ट’ भी है। क्या प्रणव झा का नाम झामुमो-कांग्रेस के रिश्तों को और प्रगाढ़ करेगा या BJP इसमें सेंधमारी का मौका खोज लेगी? 18 जून का फैसला ही तय करेगा कि रांची की राजनीति की अगली पटकथा कौन लिखेगा।


















