Venezuela's devastating earthquake caused by a violent shift of the Earth: what is the message for Jharkhand?

धरती की भयावह करवट के कारण वेनेज़ुएला का विनाशकारी भूकंप, झारखण्ड के लिये क्या है संदेश

Venezuela's devastating earthquake caused by a violent shift of the Earth: what is the message for Jharkhand?

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संतोष दीपक

24 जून 2026 को कुछ ही क्षणों के अंतराल पर 7.2 और 7.5 तीव्रता के दो शक्तिशाली भूकंप दक्षिण अमेरिकी देश वेनेज़ुएला में आये. इस भीषण भूकंप ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया. भूकंप ने राजधानी क्षेत्र तथा उत्तरी तटीय इलाकों में भारी तबाही मचा दी. हजारों भवन क्षतिग्रस्त हो गये. अनेक बहुमंजिली इमारतें मलबे में बदल गईं और बड़ी संख्या में लोग उसके नीचे दब गये. मृतकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और अबतक यह आँकड़ा एक हजार से भी अधिक तक पहुँच गया है. जबकि हजारों लोग घायल हुए तथा अनेक अबतक लापता बताये जा रहे हैं.

भूकंप के बाद का दृश्य किसी युद्धग्रस्त क्षेत्र से कम नहीं होता. सड़कों की दरारें, बाधित बिजली व्यवस्था, अस्पतालों पर अचानक रोगियों का भारी दबाव और हजारों परिवार खुले आसमान के नीचे रात बिताने को मजबूर. यही है भूकंप प्रभावित क्षेत्र का परिदृश्य जो वेनेज़ुएला में भी नजर आया. भय का वातावरण इतना गहरा था कि लोग बार-बार आने वाले झटकों के कारण अपने घरों में लौटने से डर रहे थे. बचाव दल मलबे में फँसे लोगों को निकालने के लिये अब भी दिन-रात कार्य कर रहे हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय सहायता टीमें भी राहत अभियान में शामिल हैं.

एक भूकंप विशेषज्ञ के दृष्टिकोण से देखें तो इस विनाश का सबसे प्रमुख कारण पृथ्वी की विवर्तनिक प्लेटों की गतिविधि है. वेनेज़ुएला का उत्तरी भाग उस क्षेत्र में स्थित है जहाँ कैरेबियन प्लेट और दक्षिण अमेरिकी प्लेट एक-दूसरे के सापेक्ष लगातार खिसक रही है. करोड़ों वर्षों से इन प्लेटों के बीच तनाव जमा होता रहता है. जब यह तनाव चट्टानों की सहन-सीमा से अधिक हो जाता है तब अचानक ऊर्जा मुक्त होती है और धरती तीव्रता से कांप उठती है. यही ऊर्जा भूकंपीय तरंगों के रूप में चारों दिशाओं में फैलती है और बड़े पैमाने पर विनाश का कारण बनती है. इस घटना में भी विशेषज्ञों का मानना है कि दो शक्तिशाली भ्रंश रेखाओं पर संचित तनाव एक साथ मुक्त होने के कारण दोहरे भूकंप ने तबाही को कई गुना बढ़ा दिया.

यह त्रासदी मानवता के लिये एक गंभीर चेतावनी है कि भूकंप को रोका नहीं जा सकता. परंतु वैज्ञानिक तैयारी, भूकंपरोधी निर्माण, सुदृढ़ आपदा प्रबंधन और जन-जागरूकता के माध्यम से उसके विनाशकारी प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है. प्रकृति जब अपनी शक्ति का प्रदर्शन करती है, तब मनुष्य को अपनी सीमाओं का एहसास अवश्य हो जाता है. लेकिन अफसोस की बात है कि धरती के इस छोर से उस छोर तक आदम जात के अधिकांश बच्चों ने जैसे कुछ न सीखने की कसम खा रखी है.

बेनेजुएला की त्रासदी वाकई गंभीर है. परन्तु आज अपने अन्दर झाँकने अर्थात झारखण्ड में भूकंप की आशंका, तमाम भौगोलिक परिस्थितियाँ आदि के साथ ही बहुत सारे पहलुओं पर गौर करना बहुत अधिक आवश्यक है.

झारखण्ड में भूकंप की आशंका : पहले बात दक्षिण छोटानागपुर की.

दक्षिण छोटानागपुर की भौगोलिक वास्तविकता, संभावित खतरे और बचाव की रणनीति.

झारखण्ड को सामान्यतः खनिज संपदा, पठारी भू-आकृति और स्थिर भूभाग वाले राज्य के रूप में देखा जाता है. अनेक लोगों की धारणा है कि हिमालयी क्षेत्र से दूर होने के कारण झारखण्ड, भूकंप के खतरे से लगभग सुरक्षित है. किंतु भूगर्भ विज्ञान इस धारणा को पूरी तरह सही नहीं मानता. विशेषकर दक्षिण छोटानागपुर क्षेत्र, जिसमें रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा, लोहरदगा तथा पश्चिमी सिंहभूम के बड़े भाग शामिल हैं, भले ही अत्यधिक भूकंपीय क्षेत्र नहीं है, फिर भी यह पूरी तरह भूकंप-मुक्त भी नहीं है.

दक्षिण छोटानागपुर की भौगोलिक संरचना क्या कहती है ?

दक्षिण छोटानागपुर पठार विश्व के प्राचीनतम भूभागों में गिना जाता है. इसकी आधारशिला मुख्यतः ग्रेनाइट, ग्नाइस, शिस्ट तथा कायांतरित चट्टानों से निर्मित है, जिनकी आयु करोड़ों वर्ष पुरानी मानी जाती है. यह भूभाग भारतीय प्रायद्वीपीय ढाल का हिस्सा है, जिसे अपेक्षाकृत स्थिर भूभाग माना जाता है. किन्तु यह महत्वपूर्ण है कि “स्थिर” का अर्थ “पूर्णतः निष्क्रिय” नहीं होता. भूवैज्ञानिक अध्ययनों से ज्ञात होता है कि छोटानागपुर पठार में अनेक प्राचीन भ्रंश (Faults), दरारें (Fractures), जॉइंट्स और विवर्तनिक रेखाएँ मौजूद हैं. अतीत में इस क्षेत्र में व्यापक भूगर्भीय हलचलें हुई हैं, जिनके प्रमाण चट्टानों में आज भी सुरक्षित हैं.

झारखण्ड के आसपास निम्नलिखित संरचनाएँ विशेष महत्व रखती है –

दामोदर भ्रंश क्षेत्र,
मुंगेर–साहेबगंज भ्रंश तंत्र,
राजमहल क्षेत्र,
तातापानी भ्रंश पट्टी,
सिंहभूम क्रेटोनिक बेल्ट तथा
दामोदर घाटी क्षेत्र.

ये सभी भूगर्भीय संरचनाएँ भविष्य में ऊर्जा संचयन और उसके मुक्त होने की संभावनाओं को पूरी तरह समाप्त नहीं करती.

झारखण्ड किस भूकंपीय क्षेत्र में आता है?

भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा निर्धारित भूकंपीय मानचित्र के अनुसार झारखण्ड के अधिकांश दक्षिणी जिले भूकंपीय क्षेत्र (Seismic Zone-II) में आते हैं, जिसे निम्न-मध्यम जोखिम वाला क्षेत्र माना जाता है. जबकि राज्य के कुछ उत्तरी एवं उत्तर-पूर्वी भाग अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील श्रेणियों में रखे गए हैं. रांची और जमशेदपुर जैसे प्रमुख शहर सामान्यतः मध्यम स्तर के भूकंपीय खतरे वाले क्षेत्र माने जाते हैं.

विशेषज्ञों के अनुसार रांची क्षेत्र में अगले 50 वर्षों में हानिकारक भूकंपीय कंपन होने की लगभग 10 प्रतिशत आशंका मानी जाती है. इसका अर्थ यह नहीं कि विनाशकारी भूकंप निश्चित रूप से आयेगा ही बल्कि, यह संकेत है कि निर्माण और नियोजन में भूकंप प्रतिरोधी मानकों की अनदेखी किसी भी हाल में नहीं की जानी चाहिये.

क्या दक्षिणी छोटानागपुर में बड़ा भूकंप आ सकता है?

भूगर्भ विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय की तरह 8 या 9 तीव्रता के महाभूकंप की संभावना दक्षिण छोटानागपुर में अत्यंत कम है.
लेकिन 5.0 से 6.5 तीव्रता तक के मध्यम भूकंपों की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता.
ऐसे भूकंप आने के पीछे मुख्य कारण निम्न सकते हैं —
प्राचीन भ्रंश रेखाओं का पुनः सक्रिय होना.
पृथ्वी के भीतर संचित तनाव का अचानक मुक्त होना.
दूरस्थ बड़े भूकंपों के प्रभाव से तनाव संतुलन में परिवर्तन.
खनन गतिविधियों से स्थानीय स्तर पर भूगर्भीय असंतुलन.
बड़े जलाशयों और बांधों के कारण उत्पन्न प्रेरित भूकंपीयता.
छोटानागपुर पठार पर किये गये हालिया भूकंपीय अध्ययन बताते हैं कि कुछ भागों में भूमि त्वरण (Peak Ground Acceleration) मध्यम स्तर तक पहुँच सकता है, इसलिए भविष्य के निर्माण में अतिरिक्त सावधानी आवश्यक है.

यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है कि यदि दक्षिणी छोटानागपुर में 6 तीव्रता का भूकंप आये तो क्या होगा ?

रांची, जमशेदपुर और आसपास के नगर तीव्र गति से शहरीकरण के दौर से गुजर रहे हैं. बहुमंज़िली इमारतें, संकरी गलियाँ, अनियोजित कॉलोनियाँ और निर्माण मानकों की अनदेखी भविष्य के खतरे को बढ़ा सकती है.

संभावित प्रभाव –

1. भवन क्षति –
यदि 6.0–6.5 तीव्रता का भूकंप आता है, तो सबसे अधिक नुकसान निम्न प्रकार के भवनों को होगा—
जो बिना इंजीनियरिंग डिजाइन के बने हैं.
जिनमें निम्न गुणवत्ता की सामग्री का उपयोग हुआ है.
जिनकी नींव कमजोर मिट्टी पर रखी गयी है.
जिनमें पर्याप्त स्तंभ और बीम नहीं हैं.

2. जनहानि
घनी आबादी वाले क्षेत्रों में भवन गिरने की घटनायें हो सकती है जिससे बड़ी संख्या में जान-माल की हानि पहुँचा सकती हैं.
विशेष रूप से विद्यालय, अस्पताल, व्यावसायिक भवन, बहुमंज़िले आवासीय परिसर, पुरानी इमारतें आदि सबसे अधिक जोखिमपूर्ण होंगे.

3. आधारभूत संरचना पर भूकंप के कारण प्रभाव –
सड़कें क्षतिग्रस्त हो सकती है.
पुलों में दरारें आ सकती है.
संचरण टाॅवर गिर सकते हैं और विद्युत आपूर्ति बाधित हो सकती है.
जलापूर्ति प्रणाली प्रभावित हो सकती है.
दूरसंचार सेवायें ठप हो सकती है.

4. खनन क्षेत्रों में अतिरिक्त खतरा –
झारखण्ड एक प्रमुख खनन राज्य है. भूमिगत खदानों वाले क्षेत्रों में भूकंपीय गतिविधि से सुरंग धंसने, गैस रिसाव, भूमि धंसाव जैसी समस्यायें उत्पन्न हो सकती है.

रांची और आसपास के क्षेत्र की संवेदनशीलता

वर्तमान समय में रांची को अत्यधिक जोखिम वाला शहर नहीं माना जाता, लेकिन तीव्र शहरी विस्तार ने उसकी भूकंपीय संवेदनशीलता बढ़ा दी है. विशेषकर
कांके, रातू, नामकुम, ओरमांझी, बुंडू, खूंटी आदि क्षेत्रों में निर्माण कार्य तेजी से बढ़ रहे हैं. यदि भूगर्भीय परीक्षण के बिना बहुमंज़िले भवनों का निर्माण किया जाता है तो भविष्य में नुकसान की आशंका बढ़ सकती है. इसलिये विश्व स्तर पर यह सिद्धांत स्वीकार किया गया है कि “भूकंप लोगों को नहीं मारते, कमजोर इमारतें लोगों को मारती हैं.” झारखण्ड के परिप्रेक्ष्य में यह कथन बहुत महत्वपूर्ण है.

अब बात संथाल परगना क्षेत्र की. यह भूकंप की दृष्टि से कितना संवेदनशील है ?

संथाल परगना, झारखण्ड का वह क्षेत्र है जिसमें दुमका, देवघर, गोड्डा, पाकुड़, साहिबगंज और जामताड़ा जिले शामिल हैं. भूकंपीय दृष्टि से यह क्षेत्र दक्षिणी छोटानागपुर की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील माना जाता है.

संथाल परगना किस श्रेणी के भूकंपीय क्षेत्र (Seismic Zone) में आता है ?

भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के भूकंपीय मानचित्र के अनुसार संथाल परगना के अधिकांश जिले भूकंप क्षेत्र–III (Zone III) अर्थात मध्यम जोखिम क्षेत्र में आते हैं जबकि, गोड्डा और साहिबगंज के कुछ हिस्सों को क्षेत्र–IV (Zone IV) से प्रभावित माना गया है, जो अपेक्षाकृत अधिक जोखिम वाला क्षेत्र है.

दक्षिण झारखण्ड के रांची, खूंटी और सिंहभूम जैसे जिले सामान्यतः Zone-II में रखे जाते हैं, जबकि संथाल परगना का उत्तरी भाग उससे अधिक संवेदनशील है.

यहाँ जोखिम अधिक क्यों माना जाता है ?
इसके पीछे कई भौगोलिक कारण हैं –
1. गंगा बेसिन के निकटता –

साहिबगंज और पाकुड़ क्षेत्र गंगा मैदान के संक्रमण क्षेत्र में स्थित हैं. यहाँ अवसादी (Sedimentary) संरचनाएँ भूकंपीय तरंगों को कुछ स्थानों पर अधिक बढ़ा सकती हैं.

2. राजमहल पर्वतमाला और भ्रंश तंत्र –

संथाल परगना के उत्तर–पूर्व में स्थित राजमहल क्षेत्र प्राचीन ज्वालामुखीय गतिविधियों तथा भ्रंश रेखाओं से प्रभावित रहा है. यद्यपि यह क्षेत्र वर्तमान में सक्रिय ज्वालामुखीय क्षेत्र नहीं है, फिर भी इसकी भूगर्भीय संरचना अपेक्षाकृत जटिल है.

3. बिहार–नेपाल भूकंपीय पट्टी का प्रभाव –

संथाल परगना हिमालयी भूकंप पट्टी से बहुत दूर नहीं हैं. बड़े हिमालयी भूकंपों के झटके यहाँ तक महसूस किये जा सकते हैं. 2015 में नेपाल में आये भूकंप के कंपन झारखण्ड के कई हिस्सों, विशेषकर संथाल परगना में अनुभव किये गए थे.

क्या संथाल परगना में भूकंप आते रहे हैं ?

हाँ. ऐतिहासिक रूप से यहाँ कई हल्के और मध्यम तीव्रता के झटके दर्ज किये गये हैं. वर्ष 2015 में देवघर के निकट लगभग 4.2 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया था जिसके झटके संथाल परगना के अनेक जिलों में महसूस किये गये थे. यद्यपि इससे बड़े पैमाने पर नुकसान नहीं हुआ था लेकिन, इसने यह स्पष्ट किया कि यह क्षेत्र पूर्णतः भूकंप-मुक्त नहीं हैं.

कुछ भूवैज्ञानिक अध्ययनों में यह भी उल्लेख मिलता है कि पिछले कुछ दशकों में झारखण्ड में अनेक हल्के कंपन दर्ज किये गये हैं और संथाल परगना अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील क्षेत्रों में गिना जाता है.

बड़े भूकंप की संभावना कितनी है ?

विशेषज्ञों के अनुसार संथाल परगना में हिमालय जैसे 8–9 तीव्रता के महाभूकंप की संभावना अत्यंत कम मानी जाती है. किन्तु 5.0–5.5 तीव्रता के भूकंप की संभावना को नकारा भी नहीं जा सकता.
6.0–6.5 तीव्रता तक के भूकंप दुर्लभ हैं, परंतु भूवैज्ञानिक दृष्टि से असंभव भी नहीं हैं.
निकटवर्ती हिमालयी क्षेत्र या बिहार–नेपाल सीमा पर आने वाले बड़े भूकंपों का प्रभाव यहाँ महसूस किया जाता रहा है.
वैज्ञानिक भाषा में कहा जाए तो संथाल परगना Low to Moderate Seismic Risk Region अर्थात निम्न से मध्यम भूकंपीय जोखिम वाले क्षेत्रों में आता है.

आम लोगों को क्या सावधानियाँ अपनानी चाहिये ?

घर का निर्माण इंजीनियर एवं आर्किटेक्ट की सलाह से करायें.

भवनों निर्माण में भूकंपरोधी डिजाइन अपनायें.
भारी अलमारियों को दीवार से मजबूती से बाँधें.
गैस सिलेंडर सुरक्षित स्थान पर रखें.
आपदा किट तैयार रखें.
परिवार के सभी सदस्यों को आपदा प्रशिक्षण दें.

भूकंप के दौरान

यदि भवन के अंदर हों –
झुको-ढ़को-पकड़ो (Drop, Cover, Hold On)
जमीन पर बैठ जायें.
मजबूत मेज के नीचे जायें.
सिर और गर्दन को सबसे पहले सुरक्षित रखें.
खिड़कियों से दूर रहें.
लिफ्ट का उपयोग न करें.

यदि बाहर हों..

खुले स्थान में चले जायें.
बिजली के खंभों से दूर रहें.
भवनों की दीवारों के पास न खड़े हों.

यदि वाहन चला रहे हों तो –
सुरक्षित स्थान पर वाहन रोक दें.
पुलों और फ्लाईओवर से दूर रहें.

भूकंप के बाद –

गैस लाइन की जाँच करें.
क्षतिग्रस्त भवन में प्रवेश न करें.
अफवाहों पर विश्वास न करें.
प्रशासनिक निर्देशों का पालन करें.

झारखण्ड सरकार को निम्न कदम तत्काल और दीर्घकालीन दोनों स्तरों पर उठाने चाहिये –

1. विस्तृत भूकंपीय मानचित्रण –
राज्य का उच्च-रिज़ॉल्यूशन माइक्रो-ज़ोनेशन किया जाये.
रांची, जमशेदपुर, बोकारो और धनबाद जैसे शहरों के लिये अलग भूकंपीय मानचित्र तैयार किये जायें

2. निर्माण नियमों का कठोर अनुपालन –
सभी नये भवनों के निर्माण में भारतीय मानक संहिता –
IS 1893
IS 4326
IS 13920
का पालन अनिवार्य रूप से किया जाये. बिना संरचनात्मक स्वीकृति के भवन निर्माण की अनुमति किसी भी हाल में न दी जाये.

3. पुराने भवनों का पुनर्सुदृढ़ीकरण –
सरकारी भवनों का सर्वेक्षण किया जाये. विशेषकर स्कूल, अस्पताल, सचिवालय, थाना एवं अन्य पुलिस भवन, सामुदायिक केन्द्र आदि को विशेष रूप से भूकंपरोधी बनाया जाये.

4. भूगर्भीय परीक्षण अनिवार्य हो-
चार मंजिल से अधिक ऊँचे भवनों के लिये मिट्टी परीक्षण, शैल संरचना विश्लेषण, भूजल अध्ययन जैसे मानकों के अनुपालन को अनिवार्य किया जाना चाहिये.

5. आपदा प्रबंधन क्षमता बढ़ाई जाये –
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को आधुनिक उपकरण दिये जायें.
राहत दलों को नियमित प्रशिक्षण मिले और इसका लिये नियोजित व्यवस्था हो. हर जिले में खोज एवं बचाव की इकाइयाँ विकसित की जाये.

6. जन-जागरूकता अभियान –
विद्यालयों में भूकंप सुरक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाये.
प्रत्येक वर्ष नियमित रूप से मॉक ड्रिल आयोजित की जाये.
पंचायत स्तर तक जागरूकता अभियान चलाया जाये.
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि दक्षिणी छोटानागपुर क्षेत्र अत्यधिक भूकंपीय खतरे वाला क्षेत्र नहीं है, परंतु इसे पूरी तरह सुरक्षित मान लेना भी वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा. यहाँ की प्राचीन भूगर्भीय संरचनाएँ, भ्रंश रेखाएँ, बढ़ता शहरीकरण और अनियोजित निर्माण भविष्य में मध्यम स्तर के भूकंप को भी गंभीर आपदा में बदल सकती है. इसलिये झारखण्ड के लिये सबसे बड़ी आवश्यकता भय पैदा करना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तैयारी करना है. यदि आज से ही भूकंपरोधी निर्माण, भूगर्भीय अध्ययन, जन-जागरूकता और सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाये, तो भविष्य में आने वाली किसी भी प्राकृतिक चुनौती का सामना कहीं अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकेगा. यही सतत विकास और सुरक्षित समाज की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम होगा.

वहीं संथाल परगना के संदर्भ में बात की जाये तो यह झारखण्ड का अपेक्षाकृत अधिक भूकंपीय संवेदनशील क्षेत्र है, लेकिन इसे अत्यधिक जोखिम वाले हिमालयी क्षेत्रों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.
यह क्षेत्र मुख्यतः Zone III तथा आंशिक रूप से Zone IV के प्रभाव में है. इसलिये यहाँ भय की आवश्यकता नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तैयारी की आवश्यकता है. भवन निर्माण में भूकंपरोधी मानकों का पालन, भूमि परीक्षण, आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण और जन-जागरूकता से भविष्य के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है. यदि बड़ा भूकंप आया तो सबसे अधिक जोखिम घनी आबादी वाले नगरों, बिना इंजीनियरिंग डिजाइन के बने भवनों, पुराने सरकारी भवनों, विद्यालय भवन एवं अस्पतालों के साथ ही पत्थर और ईंट से बने पारंपरिक मकान पर भी होगा. नदी तटीय अवसादी क्षेत्र, विशेष रूप से देवघर, दुमका, गोड्डा, साहिबगंज आदि में भविष्य के निर्माण कार्यों में भूकंपरोधी तकनीकों को अपनाना अत्यंत महत्वपूर्ण है.

 

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