24 साल पुराने तलाक विवाद में पति को झटका, झारखंड हाईकोर्ट ने कहा- क्रूरता और व्यभिचार के आरोप साबित नहीं, फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार

रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 2002 से चल रहे एक लंबे वैवाहिक विवाद में पति की तलाक याचिका को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया है। अदालत ने कहा कि पति अपनी पत्नी के खिलाफ लगाए गए क्रूरता (Cruelty) और व्यभिचार (Adultery) जैसे गंभीर आरोपों को विश्वसनीय और ठोस साक्ष्यों से साबित करने में पूरी तरह असफल रहा। केवल आरोप, संदेह और अनुमान के आधार पर विवाह विच्छेद की अनुमति नहीं दी जा सकती।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने फर्स्ट अपील संख्या-121/2019 पर सुनवाई करते हुए जमशेदपुर फैमिली कोर्ट द्वारा 4 जनवरी 2019 को दिए गए फैसले को बरकरार रखा और पति की अपील खारिज कर दी।
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क्या था पूरा मामला
दोनों की शादी 3 जुलाई 1987 को हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी। पति ने वर्ष 2002 में फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर करते हुए आरोप लगाया कि शादी के बाद से पत्नी का व्यवहार उसके और उसके माता-पिता के प्रति अत्यंत क्रूर रहा। उसने कहा कि पत्नी बिना बताए मायके चली जाती थी, अक्सर झगड़ा करती थी, आत्महत्या की धमकी देती थी, वैवाहिक संबंध बनाने से इनकार करती थी और दूसरे व्यक्ति से संबंध रखती थी। पति ने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी के परिजनों ने उसे जान से मारने की धमकी दी और उसके पैतृक गांव में डकैती कराने की भी कोशिश की।
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शुरुआत में फैमिली कोर्ट ने पति के पक्ष में तलाक का आदेश दिया था, लेकिन वर्ष 2016 में झारखंड हाईकोर्ट ने उस आदेश को निरस्त करते हुए मामला दोबारा सुनवाई के लिए फैमिली कोर्ट भेज दिया। इसके बाद दोबारा सुनवाई हुई और फैमिली कोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में तलाक की याचिका खारिज कर दी। इसी आदेश को पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
पत्नी ने लगाए दहेज प्रताड़ना के आरोप
पत्नी ने अदालत में पति के सभी आरोपों को निराधार बताया। उसने कहा कि विवाह के समय उसके परिवार ने नकद राशि और घरेलू सामान सहित दहेज दिया था, लेकिन बाद में रंगीन टीवी और अन्य सामान की मांग की गई। मांग पूरी नहीं होने पर उसे प्रताड़ित किया गया, भोजन तक नहीं दिया गया और कई बार मारपीट कर घर से निकाल दिया गया।
पत्नी ने अदालत को बताया कि वह हमेशा पति के साथ रहना चाहती थी, लेकिन पति और उसके परिवार ने उसे स्वीकार नहीं किया। उसने यह भी कहा कि प्रताड़ना से परेशान होकर उसे दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज कराना पड़ा।
हाईकोर्ट ने कहा- पति के आरोपों का कोई ठोस आधार नहीं
खंडपीठ ने दोनों पक्षों की गवाही और दस्तावेजों का विस्तार से परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि पति ने जिन घटनाओं को क्रूरता का आधार बताया, उनके समर्थन में कोई स्वतंत्र या विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया।
जिरह के दौरान पति ने स्वयं स्वीकार किया कि उसने पत्नी के कथित क्रूर व्यवहार, जान से मारने की धमकी या कथित अवैध संबंधों के संबंध में कभी कोई पुलिस शिकायत दर्ज नहीं कराई और न ही किसी न्यायालय में कोई स्वतंत्र मुकदमा दायर किया।
अदालत ने कहा कि यदि आरोप इतने गंभीर थे तो उनके समर्थन में कुछ न कुछ ठोस कार्रवाई या दस्तावेज होने चाहिए थे, लेकिन ऐसा कुछ भी रिकॉर्ड पर नहीं है।
गवाह भी नहीं कर सके आरोपों की पुष्टि
पति की ओर से पेश गवाह भी अदालत में आरोपों की पुष्टि नहीं कर सके। गवाह ने स्वीकार किया कि उसने पत्नी को किसी अन्य व्यक्ति के साथ आपत्तिजनक स्थिति में कभी नहीं देखा। उसने यह भी माना कि कथित अवैध संबंधों की जानकारी उसे स्वयं पति से मिली थी।
यही नहीं, उसी गवाह ने जिरह में यह भी स्वीकार किया कि पति ने दूसरी शादी कर ली है और उस विवाह से उसका एक पुत्र भी है।
दूसरी शादी का तथ्य भी आया सामने
सुनवाई के दौरान पत्नी और उसके गवाहों ने लगातार यह कहा कि पति ने दूसरी शादी कर ली है। अदालत ने पाया कि इस तथ्य का प्रभावी खंडन नहीं किया गया। अदालत ने माना कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों से यह तथ्य सामने आया कि पति ने पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी की थी।
व्यभिचार के आरोप पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
पति ने पत्नी पर एक व्यक्ति के साथ अवैध संबंध होने का आरोप लगाया था। हाईकोर्ट ने कहा कि व्यभिचार का आरोप अत्यंत गंभीर होता है और इसे केवल संदेह या अनुमान के आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने पाया कि—
पति ने कभी पत्नी को किसी अन्य व्यक्ति के साथ आपत्तिजनक स्थिति में नहीं देखा।
कथित अवैध संबंध की कोई प्रत्यक्ष गवाही नहीं है।
कोई दस्तावेजी या परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी प्रस्तुत नहीं किया गया।
जिस व्यक्ति पर पत्नी के साथ संबंध होने का आरोप लगाया गया, उसे मुकदमे में पक्षकार भी नहीं बनाया गया।
अदालत ने कहा कि ऐसे गंभीर आरोपों से किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा प्रभावित होती है, इसलिए बिना पर्याप्त साक्ष्य के ऐसे आरोप स्वीकार नहीं किए जा सकते।
झूठे आरोप भी मानसिक क्रूरता
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि पति या पत्नी अपने जीवनसाथी पर बिना आधार के विवाहेतर संबंध जैसे गंभीर आरोप लगाते हैं, तो यह स्वयं मानसिक क्रूरता माना जा सकता है।
अदालत ने कहा कि इस मामले में पति पत्नी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित नहीं कर पाया। ऐसे में निराधार आरोप लगाना भी पत्नी के प्रति मानसिक क्रूरता का उदाहरण है।
फैमिली कोर्ट के फैसले में नहीं मिली कोई त्रुटि
खंडपीठ ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने सभी मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का सही तरीके से मूल्यांकन किया है। उसके निष्कर्ष न तो मनमाने हैं और न ही कानून के विपरीत। इसलिए उसके निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं बनता।
अपील खारिज
सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद झारखंड हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट द्वारा तलाक की याचिका खारिज किए जाने के आदेश को बरकरार रखा। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर ही क्रूरता या व्यभिचार सिद्ध माना जा सकता है।















