ढाई साल की उम्र में पढ़ने की जिद, शिक्षक ने पहचानी असाधारण प्रतिभा

शंभू कुमार सिंह
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!सिमडेगा: प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती। अगर उसे सही समय पर पहचान और उचित मार्गदर्शन मिले, तो कम उम्र में भी बच्चे अपनी असाधारण क्षमता का परिचय दे सकते हैं। सिमडेगा के ढाई वर्षीय प्रिंस टोप्पो इसकी मिसाल बनकर सामने आए हैं। जिस उम्र में अधिकांश बच्चे खेल-कूद में व्यस्त रहते हैं, उस उम्र में प्रिंस स्कूल जाकर पढ़ने और नई चीजें सीखने की जिद कर रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिक्षक अंजनी कुमार सिंह ने प्रिंस की प्रतिभा को करीब से महसूस किया है। उन्होंने बताया कि अपने 25 वर्षों के अध्यापन करियर में उन्होंने पहली बार ऐसा बच्चा देखा है, जिसकी उम्र अभी औपचारिक रूप से स्कूल जाने की नहीं है, लेकिन पढ़ने और सीखने की उसकी ललक उम्र से कहीं आगे है।

अंजनी कुमार सिंह के अनुसार, प्रिंस की आंखों में सीखने की उत्सुकता और हर नई चीज को जानने की जिज्ञासा ने उनका ध्यान आकर्षित किया। उनका मानना है कि बच्चे की प्रतिभा को केवल उम्र या नियमों के आधार पर सीमित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उसकी रुचि और क्षमता के अनुरूप सीखने का अवसर दिया जाना चाहिए।.इसी सोच के साथ उन्होंने प्रिंस की जरूरतों को समझते हुए उसे आवश्यक शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास शुरू किया है, ताकि उसकी जिज्ञासा और प्रतिभा को सही दिशा मिल सके।

अंजनी कुमार सिंह ने कहा कि “हीरे की परख जौहरी ही कर सकता है और वही उसे तराशकर कीमती बनाता है।” इसी तरह किसी बच्चे की प्रतिभा को पहचानने और उसे निखारने के लिए सही मार्गदर्शन जरूरी है। असाधारण प्रतिभा कई बार उम्र की सीमा से परे होती है और उसे केवल एक अवसर तथा पहचानने वाली नजर की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि यदि प्रिंस को उचित मार्गदर्शन, पढ़ाई की सुविधाएं, बेहतर शैक्षणिक वातावरण के साथ खेलकूद का पर्याप्त अवसर मिले, तो वह भविष्य में जिले, राज्य और देश का नाम रोशन कर सकता है।
ढाई वर्षीय प्रिंस की पढ़ने और सीखने की जिद उसके परिवार के लिए उम्मीद की किरण है। साथ ही यह घटना समाज को भी संदेश देती है कि बच्चों की प्रतिभा को केवल उम्र के आधार पर नहीं आंकना चाहिए। उनकी रुचि और क्षमता को पहचानकर सही दिशा और अवसर देना जरूरी है।
















