क्या भारत में IB बोर्ड अमीरों की शिक्षा का नया मॉडल बन रहा है? क्या शिक्षा भी वर्गों में बंट गई है गुरुकुल से IB बोर्ड तक का सफर

भारत की संस्कृति में शिक्षा को हमेशा समान अवसर का माध्यम माना गया। हमारे धार्मिक ग्रंथों में ऐसे प्रसंग मिलते हैं, जहां भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा ने एक ही गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त की। इसी तरह भगवान श्रीराम और निषादराज की मित्रता का प्रसंग सामाजिक समानता का संदेश देता है। इन कथाओं का मूल भाव यह है कि ज्ञान का अधिकार व्यक्ति की आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि उसकी सीखने की इच्छा से तय होना चाहिए।
लेकिन आज का भारत एक अलग तस्वीर पेश करता है।
एक ओर संसाधनों की कमी से जूझते सरकारी स्कूल हैं। दूसरी ओर CBSE और ICSE जैसे निजी बोर्ड हैं। इनके ऊपर एक और परत है—अंतरराष्ट्रीय शिक्षा का प्रतीक माने जाने वाले IB (International Baccalaureate) स्कूल, जहां सालाना फीस कई लाख रुपये से लेकर कुछ संस्थानों में 15–20 लाख रुपये या उससे भी अधिक हो सकती है।
सबसे बड़ा सवाल – क्या शिक्षा अब केवल संपन्न वर्ग तक सीमित हो रही है?
भारत में अधिकांश IB स्कूलों की वार्षिक फीस लगभग 2.5 लाख रुपये से शुरू होकर कई स्कूलों में 10 से 20 लाख रुपये या उससे भी अधिक है। ऐसे में मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों के लिए इस शिक्षा तक पहुंच लगभग असंभव हो जाती है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जब देश की बड़ी आबादी अभी भी सरकारी और कम संसाधनों वाले स्कूलों पर निर्भर है, तब अत्यधिक महंगी शिक्षा व्यवस्था सामाजिक दूरी बढ़ा सकती है। IB स्कूलों तक पहुंच मुख्य रूप से आर्थिक रूप से अत्यंत मजबूत परिवारों की होती है।
क्या गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अब आर्थिक क्षमता पर निर्भर होती जा रही है?
भारत में आज भी करोड़ों परिवार ऐसे हैं, जिनकी वार्षिक आय किसी एक IB स्कूल की फीस से भी कम है। ऐसे में क्या एक गरीब या निम्न मध्यमवर्गीय परिवार का प्रतिभाशाली बच्चा उसी गुणवत्ता की शिक्षा तक पहुंच बना सकता है, जो एक संपन्न परिवार के बच्चे को मिलती है?
बताया जाता है की IB बोर्ड शोध, आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता और वैश्विक दृष्टिकोण विकसित करता है। लेकिन सवाल यह है की इतनी महंगी शिक्षा अनजाने में शिक्षा के अवसरों को आर्थिक वर्गों के आधार पर अलग कर सकती है।
सवाल किसी एक बोर्ड के पक्ष या विपक्ष की नहीं है। असली प्रश्न यह है कि क्या भारत में ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित हो सकती है, जहां सरकारी स्कूल का बच्चा भी वही प्रयोगशालाएं, प्रशिक्षित शिक्षक, भाषा कौशल और अवसर प्राप्त करे, जो किसी महंगे अंतरराष्ट्रीय स्कूल के छात्र को मिलते हैं?
भारत का संविधान समान अवसर की बात करता है। इसलिए यह सवाल उठना लाजमी है की शिक्षा पर बहस का केंद्र क्या हो ? कौन-सा बोर्ड बेहतर है, यह सवाल भारत जैसे विकासशील देश के लिए नही होना चाहिए बल्कि सवाल यह है की देश का हर बच्चा, चाहे वह गरीब हो या अमीर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा समान रूप से कैसे हासिल करे।
ऐसे जानकार बताते है की IB बोर्ड अंतरराष्ट्रीय स्कूलों द्वारा चलाया जाता है। शुरुआती दौर में इसका मुख्य उद्देश्य उन परिवारों के बच्चों को पढ़ाना था जो विदेश में रहते या काम करते थे, जैसे राजनयिक (Diplomats), बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अधिकारी और प्रवासी परिवार के लिए होती थी।
अब हम आपको स्कूलों की कुछ लिस्ट के साथ छोड़े जाते है..
भारत के जिन शहरों में सबसे अधिक IB स्कूल हैं, उनमें शामिल हैं: मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई, पुणे, अहमदाबाद, कोलकाता, जयपुर, कोयंबटूर
मुंबई:
Dhirubhai Ambani International School
Oberoi International School
Ascend International School
JBCN International School Parel
दिल्ली:
The British School
Apeejay School International
K.R. Mangalam Global School
बेंगलुरु:
Indus International School Bangalore
Canadian International School
Bangalore International School
Stonehill International School

















