Ranchi's Jagannathpur Temple: 335 Years of Faith

रांची का जगन्नाथपुर मंदिर: 335 वर्षों की आस्था, इतिहास और सामाजिक समरसता का प्रतीक

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वरिष्ठ पत्रकार निलय सिंह की कलम से

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भगवान जगन्नाथ आज एकांत बात से बाहर आएंगे भाई बहनों के साथ पूरे विश्व को आशीर्वाद देंगे । आज प्रभु का नेत्रदान महोत्सव है और कल रथ यात्रा । लेकिन आज हम आपसे जगन्नाथपुर रथ मेला की बात नहीं करेंगे बल्कि भगवान जगन्नाथ के मंदिर की भव्यता और उसके पौराणिक कथा पर एक नजर डालेंगे ।

रांची के धुर्वा स्थित जगन्नाथपुर मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का एक सशक्त स्तंभ है। ओडिशा के विश्व प्रसिद्ध पुरी मंदिर की तर्ज पर निर्मित यह मंदिर कलिंग वास्तुकला की उत्कृष्ट छटा बिखेरता है।

स्थापना की दिव्य कथा

इस मंदिर का 25 दिसंबर 1691 को बड़कागढ़ के नागवंशी राजा ठाकुर एनीनाथ शाहदेव के हाथों पूरा हुआ और इसी दिन प्रभु के दर्शन ले लिए  पट खोल दिया गया । वैसे मंदिर के निर्माण के पीछे एक भावुक और चमत्कारी कथा प्रचलित है।

Ranchi's Jagannathpur Temple: 335 Years of Faith

कहा जाता है कि राजा एनीनाथ शाहदेव भगवान जगन्नाथ के परम भक्त थे। एक बार उनके साथ गए एक गरीब सेवक ने भगवान की भक्ति में अन्न-जल त्याग दिया था। ऐसी मान्यता है कि स्वयं महाप्रभु ने उस सेवक की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें अपने भोग की थाली अर्पित की थी। जब यह चमत्कार राजा के संज्ञान में आया, तो भगवान ने स्वप्न में उन्हें अपने राज्य में ही मंदिर निर्माण का आदेश दिया।

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सामाजिक समरसता की अनूठी मिसाल

ठाकुर एनीनाथ शाहदेव ने इस मंदिर के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों को एक सूत्र में पिरोने का अनूठा प्रयास किया। मंदिर की व्यवस्था में हर समुदाय को एक विशिष्ट जिम्मेदारी सौंपी गई, जो आज भी कायम है:

समुदायसौंपी गई जिम्मेदारीउरांव समाजमंदिर की घंटी, तेल और भोग सामग्री की व्यवस्थामुंडा परिवारशिखर पर झंडा फहराना, पगड़ी देना और वार्षिक पूजारजवार/अहीरविग्रहों को गर्भगृह तक ले जानाबढ़ई परिवारमंदिर का रंग-रोगनलोहरा परिवाररथ की मरम्मतकुम्हार परिवारमिट्टी के बर्तनों की आपूर्तिघासी समाजफूल-माला और ढोल-नगाड़े की व्यवस्थामुस्लिम समुदायसदियों तक मंदिर की सुरक्षा का दायित्व

स्वतंत्रता संग्राम और मंदिर का योगदान

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में इस मंदिर की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष के दौरान इसी रथ मेले को अपने गुप्त संदेशों के आदान-प्रदान का माध्यम बनाया था। यह मेला क्रांतिकारियों के लिए एक ‘सुरक्षित सूचना केंद्र’ के रूप में कार्य करता था।

मंदिर का स्वरूप और पुनर्निर्माण

कलिंग शैली में निर्मित यह मंदिर समय की मार और संघर्षों का गवाह रहा है। 6 अगस्त 1990 को मंदिर के एक हिस्से के ढहने के बाद, 1991 में इसका जीर्णोद्धार किया गया, जो आज हमें अपने वर्तमान भव्य स्वरूप में दिखाई देता है।

भव्य रथ यात्रा: श्रद्धा का सैलाब

Ranchi's Jagannathpur Temple: 335 Years of Faith

हर वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को यहाँ ऐतिहासिक रथ यात्रा निकाली जाती है।

अवधि: नौ दिनों का भव्य मेला।

आकर्षण: मेले में पारंपरिक वाद्ययंत्र (ढोल, नगाड़े, मांडर), हस्तशिल्प, कृषि उपकरण और दुर्लभ मिठाइयाँ मिलती हैं।

आधुनिक स्वरूप: अब यह मेला पारंपरिक संस्कृति के साथ-साथ आधुनिकता का भी संगम बन गया है, जहाँ इलेक्ट्रिक झूलों और नई गतिविधियों का आनंद लेने देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु जुटते हैं।

पर्यटकों के लिए विशेष सूचना: रांची आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए जगन्नाथपुर मंदिर एक ‘मस्ट विजिट’ (Must Visit) स्थल है। यहाँ की वास्तुकला और शांति, दर्शकों को एक अलौकिक अनुभव प्रदान करती है।

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