आरक्षण का आधार सिर्फ जाति नहीं: सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में बार-बार आया यह सिद्धांत, फिर आज आरक्षण के बहस में क्यों कम होती है इस बात की चर्चा ?
1963 से 2024 तक सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में जाति को पिछड़ेपन का एक आधार माना गया, लेकिन अकेला आधार नहीं; संविधान सभा ने भी आरक्षण पर विस्तार से की थी बहस
भारत में आरक्षण पर बहस अक्सर इस सवाल के इर्द-गिर्द घूमती है कि किस जाति या समुदाय को कितने प्रतिशत आरक्षण मिला। लेकिन संविधान और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का इतिहास बताता है कि आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था का आधार केवल जाति नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि जाति सामाजिक पिछड़ेपन की पहचान का एक प्रासंगिक आधार हो सकती है, लेकिन केवल जाति को ही पिछड़ेपन का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। 2024 में सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ के फैसले में भी पुराने फैसलों का उल्लेख करते हुए इसी न्यायिक विकास को दर्ज किया गया।
1963 का M.R. Balaji फैसला: जाति महत्वपूर्ण, लेकिन अकेला आधार नहीं
इस बहस की महत्वपूर्ण शुरुआत M.R. Balaji बनाम State of Mysore मामले से होती है। 1963 में सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के निर्धारण पर विचार करते हुए कहा कि जाति एक प्रासंगिक विचार हो सकती है, लेकिन किसी वर्ग को पिछड़ा घोषित करने का अकेला आधार नहीं हो सकती। और 2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में Balaji के सिद्धांत को दोहराते हुए बताया गया कि उस मामले में अदालत ने जाति को सामाजिक पिछड़ेपन के निर्धारण में relevant consideration माना था, लेकिन जाति को sole basis बनाने से इनकार किया था।

Chitralekha केस: पिछड़ेपन की पहचान केवल जाति से जरूरी नहीं
इसके बाद Chitralekha v. State of Mysore में भी अदालत के सामने यही सवाल आया कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़े वर्ग की पहचान कैसे की जाए। सुप्रीम कोर्ट के बाद के फैसलों में इस मामले का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि जाति के अलावा अन्य सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को भी पिछड़ेपन के निर्धारण में देखा जा सकता है।
फिर आया Indra Sawhney यानी मंडल फैसला
आरक्षण के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण मामलों में से एक है Indra Sawhney v. Union of India (1992)। इस मामले में नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने OBC आरक्षण से जुड़े कई महत्वपूर्ण सिद्धांत तय किए। यहां सुप्रीम कोर्ट ने पहले के फैसलों की तुलना में एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट की—जाति को पिछड़े वर्ग की पहचान शुरू करने का आधार बनाया जा सकता है। 2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में Indra Sawhney की व्याख्या करते हुए कहा गया कि किसी जाति को एक identifiable social group के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है और उसके भीतर सामाजिक पिछड़ेपन के मानदंड लागू किए जा सकते हैं।
जाति → पहचान का शुरुआती आधार हो सकती है
लेकिन
सिर्फ जाति → अपने आप में पिछड़ेपन का अंतिम प्रमाण नहीं है।
डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने संविधान सभा में यह तर्क रखा था कि केवल औपचारिक समानता पर्याप्त नहीं है। ऐसे समुदायों को प्रशासन में प्रवेश का अवसर देना भी जरूरी है जो अतीत में सरकारी प्रशासन से काफी हद तक बाहर रहे थे।

क्या मूल संविधान में आरक्षण का संवैधानिक आधार था?
इसके अनुसार राज्य ऐसे backward class of citizens, जिनका राज्य की सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, उनके लिए नियुक्तियों या पदों में आरक्षण का प्रावधान कर सकता है।
इसमें तीन बातें खास हैं—
Backward class
Adequate representation नहीं होना
State द्वारा reservation का प्रावधान
इस प्रावधान में किसी खास जाति का नाम नहीं दिया गया था।

तो फिर आज इस बात पर चर्चा से क्यों भागती है कोई भी सरकार
दरअसल वोट बैंक और चुनावी गणित (Vote Bank Politics)बहुसंख्यक आबादी का प्रभाव
यह एक बहुत बड़ा कारण माना जाता है। भारत की एक बहुत बड़ी आबादी (SC, ST, और OBC) आरक्षण व्यवस्था के अंतर्गत आती है। लोकतंत्र में संख्या बल ही सत्ता तय करता है, इसलिए कोई भी दल इस बड़े मतदाता वर्ग को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकता।
चुनावी नुकसान का डर:
आरक्षण विरोधी या समीक्षा की बात करने वाली किसी भी टिप्पणी को विपक्ष तुरंत “आरक्षण खत्म करने की साजिश” के रूप में प्रचारित कर देता है, जिससे चुनाव में भारी नुकसान हो सकता है।
सामाजिक ध्रुवीकरण और अशांति का खतरा (Social Unrest)कानून-व्यवस्था की स्थिति:
अतीत में आरक्षण के विरोध या समर्थन में हुए बड़े आंदोलनों ने हिंसक रूप लिया है। सरकारें समाज में किसी भी तरह के बड़े टकराव या जातीय संघर्ष (Caste Conflicts) से बचना चाहती हैं।
परस्पर विरोधी मांगें:
एक तरफ आरक्षित वर्ग मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने या दायरा बढ़ाने (जैसे जाति जनगणना की मांग) पर जोर देता है, वहीं दूसरी तरफ अनारक्षित या सामान्य वर्ग आर्थिक आधार पर समीक्षा या आरक्षण हटाने की मांग करता है। दोनों पक्षों को एक साथ संतुष्ट करना नामुमकिन होता है।

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