चाईबासा: ‘नो एंट्री’ की मांग को लेकर आर-पार की जंग, मुख्यमंत्री आवास के लिए पैदल रवाना हुए सैकड़ों आंदोलनकारी
चाईबासा: ‘नो एंट्री’ की मांग को लेकर आर-पार की जंग, मुख्यमंत्री आवास के लिए पैदल रवाना हुए सैकड़ों आंदोलनकारी
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चाईबासा: शहर में भारी वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाने की मांग अब एक बड़े जन-आंदोलन में तब्दील हो गई है। लंबे समय से प्रशासन की अनदेखी से नाराज **“नो एंट्री आंदोलन समिति, कोल्हान”** के नेतृत्व में रविवार को सैकड़ों स्थानीय लोगों ने रांची स्थित मुख्यमंत्री आवास तक 6 दिवसीय पदयात्रा शुरू कर दी है।
तांबो चौक से रांची तक का सफर
रविवार सुबह चाईबासा के तांबो चौक पर भारी संख्या में आंदोलनकारी जुटे, जहाँ से उन्होंने हुंकार भरते हुए अपनी पदयात्रा का आगाज किया। हाथों में तख्तियां और बैनर लिए युवा, बुजुर्ग और सामाजिक कार्यकर्ता सड़क पर उतरे। आंदोलनकारियों का स्पष्ट कहना है कि प्रशासन उनकी जान की कीमत पर औद्योगिक हितों को प्राथमिकता दे रहा है, जिसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
क्यों भड़का है जनता का गुस्सा?
आंदोलनकारियों ने प्रशासन के खिलाफ अपना रोष व्यक्त करते हुए निम्नलिखित प्रमुख बिंदु रखे:
अनियंत्रित रफ्तार और हादसे: शहर की तंग सड़कों पर भारी वाहनों के अनियंत्रित परिचालन से आए दिन सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं, जिनमें कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।
प्रशासनिक उदासीनता: पिछले वर्ष अक्टूबर में चक्का जाम और हाल ही में राज्यपाल को ज्ञापन सौंपने के बावजूद जिला प्रशासन ने ‘नो एंट्री’ नियम लागू करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
धूल और प्रदूषण: भारी ट्रकों की वजह से शहर में धूल और प्रदूषण का स्तर भी खतरनाक रूप से बढ़ गया है।
> “हम पिछले कई महीनों से शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रख रहे हैं, लेकिन हमारी आवाज अनसुनी कर दी गई। अब हमारे पास पदयात्रा कर मुख्यमंत्री तक अपनी बात पहुँचाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।”
समिति के सदस्य
6 दिनों का अल्टीमेटम
आंदोलन समिति ने सरकार को चेतावनी दी है कि यदि इस 6 दिवसीय पदयात्रा के भीतर सरकार की ओर से कोई सकारात्मक पहल या ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो इस आंदोलन को और उग्र किया जाएगा।
प्रशासन पर उठते बड़े सवाल
स्थानीय लोगों के बढ़ते दबाव के बावजूद जिला प्रशासन आखिर ‘नो एंट्री’ नियम लागू करने से क्यों कतरा रहा है? क्या इसके पीछे खनिज परिवहन का आर्थिक दबाव है या इच्छाशक्ति की कमी? यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
अब सबकी नजरें रांची पर टिकी हैं कि क्या मुख्यमंत्री इस पैदल जत्थे के पहुँचने से पहले कोई समाधान निकालते हैं, या फिर चाईबासा की जनता को एक बार फिर निराशा हाथ लगेगी।
रिपोर्ट: न्यूज डेस्क
















