भुवनेश्वर में करम पूर्व संध्या पर गुमला के डॉ. तेतरू उरांव ने बताई पर्व की परंपरा और विशेषता

निर्मल सिंह
भुवनेश्वर: उरांव सांस्कृतिक समाज उड़ीसा के तत्वावधान में 20 सितंबर को आदिवासी एक्जीबिशन ग्राउंड में करम पूर्व संध्या महोत्सव का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय मंत्री जुएल उरांव और ओडिशा के मंत्री नित्यानंद गोंड शामिल हुए। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में कार्तिक उरांव महाविद्यालय, गुमला के सहायक प्राध्यापक डॉ. तेतरू उरांव उपस्थित रहे। उन्होंने करम पर्व की परंपरा, सांस्कृतिक महत्व और विशेषताओं की जानकारी दी।

डॉ. तेतरू उरांव ने कहा कि कांसी फूल का खिलना करम देव के आगमन का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने करम पर्व की प्राचीन परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इसकी परंपरा हड़प्पा काल से चली आ रही है और इसका उल्लेख महली लिविंस तिर्की की पुस्तक में भी मिलता है।

उन्होंने कहा कि करम केवल भाई-बहन के रिश्ते का पर्व नहीं है, बल्कि पूरे परिवार और समाज को जोड़ने वाला पर्व है। करम कथा का संदेश है कि मनुष्य जैसा कर्म करता है, उसे उसी के अनुरूप फल प्राप्त होता है। उन्होंने करम डाली को विश्वास, प्रकृति से जुड़ाव और सामुदायिक विधान का प्रतीक बताया।

डॉ. उरांव ने जवां उगाने, तीन करम डालियां काटने और खीरा चढ़ाने जैसी परंपराओं के पीछे की वैज्ञानिकता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि करम पर्व प्रकृति और मानव के बीच गहरे संबंध को दर्शाता है तथा सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करता है। महोत्सव के दौरान कुरूख भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर केंद्रीय मंत्री जुएल उरांव को ज्ञापन भी सौंपा गया।

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