बिजली में आत्मनिर्भर हुआ झारखंड: 25 साल बाद बना ‘पावर सरप्लस’ राज्य, अब हर महीने होगी 200 करोड़ की कमाई

रांची: कोयले से पूरे देश को रोशन करने वाला झारखंड अब खुद भी बिजली के मामले में आत्मनिर्भर हो गया है। राज्य के गठन के 25 साल बाद झारखंड आधिकारिक तौर पर ‘पावर सरप्लस’ (अतिरिक्त बिजली वाला) राज्य बन गया है। बुधवार की मध्यरात्रि से पतरातू स्थित पीवीयूएनएल (PVUNL) की 800 मेगावाट क्षमता वाली दूसरी यूनिट के कॉमर्शियल ऑपरेशन शुरू होते ही यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल हुई।
बिजली की नई स्थिति
पतरातू की दोनों इकाइयों के चालू होने से अब झारखंड को कुल 1360 मेगावाट बिजली मिलेगी। राज्य के पास अब कुल उपलब्ध बिजली क्षमता 3770 मेगावाट हो गई है, जिससे राज्य के पास अब 700 मेगावाट अतिरिक्त (सरप्लस) बिजली उपलब्ध है।
किन जिलों को होगा सबसे ज्यादा फायदा?
पिछले कुछ समय से राज्य के कई जिलों में बिजली की मांग बढ़ने के कारण लोड शेडिंग और कटौती की समस्या बनी हुई थी। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा केंद्रीय ऊर्जा मंत्री के साथ समन्वय के बाद, अब डीवीसी (DVC) कमांड एरिया को अतिरिक्त 200 मेगावाट बिजली मिलेगी।
इसका सीधा लाभ इन जिलों को मिलेगा:
धनबाद, बोकारो, हजारीबाग, गिरिडीह, कोडरमा, रामगढ़ और चतरा।
इन क्षेत्रों में अब बिजली कटौती की समस्या से लोगों को बड़ी राहत मिलेगी।
राजस्व का नया स्रोत
झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड (JBVNL) अब इस अतिरिक्त बिजली को दूसरे राज्यों को बेचेगा। पीवीयूएनएल से ली गई बिजली की कीमत चुकाने के बाद, इस बिक्री से राज्य सरकार को प्रति माह लगभग 200 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होगा।
निवेशकों के लिए सुनहरा अवसर
जानकारों का मानना है कि बिजली की पर्याप्त उपलब्धता औद्योगिक विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारक है। अब यदि राज्य में कोई बड़ा निवेशक आता है, तो उसे बिजली की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा। यह औद्योगिक निवेश के लिए झारखंड को एक प्रमुख गंतव्य के रूप में स्थापित करेगा।
जाहिर है जो झारखंड दशकों से अपने कोयले से पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, यूपी और बंगाल जैसे राज्यों को रोशन कर रहा था, वह अब स्वयं बिजली के मामले में पूरी तरह सक्षम है। अब बिजली की समस्या केवल वितरण (डिस्ट्रीब्यूशन) से जुड़ी हो सकती है, क्योंकि राज्य में उत्पादन की कमी अब इतिहास बन गई है।
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